अभी तक ककोड़ा केवल सीजन के समय जंगलों से चुनकर स्थानीय बाजारों में सीमित मात्रा में बेचा जाता है, जिससे इसकी कीमतें काफी ऊंची रहती हैं। …और पढ़ें

HighLights
- सरकार ने शोध के लिए 2.5 लाख का बजट किया मंजूर
- जंगलों से निकलकर रिसर्च फार्म तक पहुंचेगा ककोड़ा
- 50 से अधिक जगहों से बीज जुटाएगी वैज्ञानिकों की टीम
नईदुनिया प्रतिनिधि, ग्वालियर। अब तक जंगलों और ग्रामीण इलाकों में प्राकृतिक रूप से उगने वाली औषधीय सब्जी ककोड़ा को अब विज्ञानी पहचान दी जाएगी। राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय पहली बार इस पारंपरिक वन उपज को एक फसल के रूप में स्थापित करने की तैयारी कर रहा है। विश्वविद्यालय के विज्ञानी ककोड़ा की एक ऐसी उन्नत किस्म विकसित करेंगे, जिससे किसानों की आय में इजाफा होगा। इस बेहद महत्वपूर्ण शोध परियोजना के लिए राज्य सरकार ने ढाई लाख रुपये का अनुदान स्वीकृत किया है।
परियोजना के तहत कृषि विज्ञानियों की एक विशेष टीम मानसून के बाद सर्वे शुरू करेगी। विज्ञानी उन जंगलों और ग्रामीण अंचलों का रुख करेंगे, जहां ककोड़ा प्राकृतिक रूप से प्रचुर मात्रा में उगता है। टीम करीब 40 से 50 अलग-अलग स्थानों से ककोड़ा के बीजों को एकत्र करेगी। इसके बाद विश्वविद्यालय के रिसर्च फार्म में इनकी पौध तैयार की जाएगी। विज्ञानी इन पौधों की गुणवत्ता, उत्पादन क्षमता और उनमें मौजूद पोषक तत्वों का गहन अध्ययन करेंगे ताकि सबसे बेहतरीन किस्म तैयार की जा सके।
किसानों के लिए खुलेगा कमाई का नया जरिया : अभी तक ककोड़ा केवल सीजन के समय जंगलों से चुनकर स्थानीय बाजारों में सीमित मात्रा में बेचा जाता है, जिससे इसकी कीमतें काफी ऊंची रहती हैं। विश्वविद्यालय के इस शोध का मुख्य उद्देश्य ऐसी किस्म विकसित करना है, जो कम लागत में अधिक उत्पादन दे सके। यदि यह प्रयोग सफल रहता है, तो ककोड़ा की खेती पारंपरिक फसलों के मुकाबले किसानों के लिए कई गुना अधिक मुनाफे का सौदा साबित होगी।
