नईदुनिया प्रतिनिधि, ग्वालियर। सुप्रीम कोर्ट ने स्कूल, कालेज और अस्पताल जैसे संवेदनशील परिसरों से आवारा कुत्तों को हटाने के निर्देश को बरकरार रखते हुए स्पष्ट किया है कि ऐसे स्थानों पर लोगों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। अदालत ने इस संबंध में दायर सभी पुनर्विचार याचिकाओं को भी खारिज करते हुए स्थानीय प्रशासन और निकायों को आवारा कुत्तों को शेल्टर होम में शिफ्ट करने के निर्देश दिए हैं।
इसके बावजूद शहर के प्रमुख अस्पतालों और कालेज परिसरों में आवारा कुत्तों की मौजूदगी लगातार बनी हुई है। नगर निगम भले ही कुत्तों को पकड़ने के लिए विशेष अभियान चलाने का दावा कर रहा हो, लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों से अलग नजर आ रही है। जया आरोग्य अस्पताल (जेएएच) परिसर में हालात सबसे ज्यादा चिंताजनक हैं। यहां हजार बिस्तर अस्पताल, कमलाराजा अस्पताल और सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल के आसपास बड़ी संख्या में आवारा कुत्ते घूमते देखे जा सकते हैं।
यहां आने वाले मरीजों, उनके स्वजन और स्टाफ के बीच इसे लेकर लगातार भय का माहौल बना हुआ है। मरीज के स्वजन रामजी लाल कुशवाह का कहना है कि रात के समय कुत्तों के झुंड अस्पताल परिसरों में अधिक सक्रिय हो जाते हैं, जिससे आने-जाने में परेशानी होती है। कई बार मरीजों और बच्चों के पीछे कुत्तों के दौड़ने की घटनाएं भी सामने आ चुकी हैं।
निगम के अभियान पर उठ रहे सवाल
नगर निगम लगातार आवारा कुत्तों को पकड़ने और नसबंदी अभियान चलाने के दावे कर रहा है, लेकिन अस्पताल और कालेज परिसरों की स्थिति इन अभियानों की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े कर रही है। लोगों का आरोप है कि अभियान केवल कागजों तक सीमित नजर आता है। यदि वास्तव में कार्रवाई हो रही होती, तो संवेदनशील परिसरों में इतनी बड़ी संख्या में कुत्ते दिखाई नहीं देते।
कालेज परिसरों में भी बढ़ रही समस्या: स्थिति केवल अस्पतालों तक सीमित नहीं है। शहर के प्रमुख शैक्षणिक संस्थानों, साइंस कालेज और एमएलबी कालेज परिसर में भी आवारा कुत्तों का जमावड़ा देखा जा सकता है। छात्र-छात्राओं का कहना है कि कालेज परिसर में कुत्तों के झुंड अक्सर परिसर और पार्किंग क्षेत्रों में बैठे रहते हैं, जिससे डर और असुरक्षा का माहौल बनता है। विशेषज्ञों का मानना है कि शिक्षा और स्वास्थ्य संस्थानों को सेंसिटिव जोन माना जाता है, जहां इस तरह की लापरवाही गंभीर खतरा पैदा कर सकती है।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद कार्रवाई अधूरी
सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि अस्पताल, स्कूल और कालेज जैसे स्थानों पर आवारा कुत्तों की मौजूदगी लोगों की सुरक्षा के लिए खतरा बन सकती है।
इसके बाद भी स्थानीय स्तर पर प्रभावी कार्रवाई न होना प्रशासनिक उदासीनता को दर्शाता है। अब सवाल यह उठ रहा है कि जब सर्वोच्च अदालत के स्पष्ट निर्देश मौजूद हैं, तो फिर संवेदनशील परिसरों को आवारा कुत्तों से मुक्त कराने की जिम्मेदारी आखिर कौन निभाएगा। इस मामले को लेकर नगर निगम के एबीसी नोडल अधिकारी केशव सिंह चौहान को फोन लगाए पर उन्होंने काल रिसीव नहीं किए।
