एनसीआरबी की रिपोर्ट में ये आंकड़े और हालिया घटनाक्रम बताते हैं-महिलाओं को दहेज का दंश किस तरह डस रहा है। …और पढ़ें

HighLights
- एनसीआरबी की ताजा रिपोर्ट में आया सामने
- रोजाना आ रहे प्रताड़ना के 20 मामले
- देश के टॉप-10 राज्यों में मप्र शामिल
नईदुनिया प्रतिनिधि, ग्वालियर। मध्यप्रदेश में लाड़ली असुरक्षित हैं। बेटी के जीवन को खुशहाल बनाने के लिए माता-पिता जीवनभर की जमा-पूंजी शादी पर खर्च कर देते हैं। दहेज लेना भले ही अपराध है, लेकिन लाखों रुपये नकद और कीमती गहने से लेकर गृहस्थी तक का सामान ससुराल वाले लेते हैं। फिर भी दहेज लोभी घर में बहू को प्रताड़ित करते हैं, यहां तक कि मरने तक के लिए मजबूर कर देते हैं।
हाल ही में दो बड़े केस ने सभी को झकझोरा
हाल ही में ग्वालियर में पलक रजक और भोपाल में ट्विशा शर्मा केस ने हर किसी को झकझोर कर रख दिया। यह सिर्फ दो मामले नहीं बल्कि हर रोज दहेज के लिए मध्यप्रदेश में बेटियां मारी जा रही हैं। बेटियों की सुरक्षा और महिलाओं के स्वावलंबन के लिए चलाई जा रही तमाम योजनाओं और दावों के बीच यह कड़वी हकीकत है- यहां साक्षरता भले ही बढ़ गई हो, लेकिन लोगों की सोच अब भी पुरानी है। यही कारण है- अब भी दहेज के लिए बहुओं को प्रताड़ित किया जा रहा है, मरने के लिए मजबूर किया जा रहा है।
नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो की ताजा रिपोर्ट के आंकड़े भी डरा देने वाले हैं। एनसीआरबी की रिपोर्ट बताती है- दहेज हत्या के मामले में मप्र देश में तीसरे नंबर पर है। पहले नंबर पर उप्र और दूसरे नंबर पर बिहार। यह आंकड़े और हालिया घटनाक्रम बताते हैं- महिलाओं को दहेज का दंश किस तरह डस रहा है।
पति और ससुराल वालों की प्रताड़ना के हर दिन 20 मामले
नईदुनिया ने जब एनसीआरबी रिपोर्ट के आधार पर आंकड़ों का विश्लेषण किया तो सामने आया कि पति और ससुराल वालों द्वारा बहू को प्रताड़ित करने के हर दिन 20 मामले प्रदेश में आते हैं। सालभर में 7514 मामले पति व ससुराल द्वारा प्रताड़ित किए जाने के सामने आए। मप्र इन घटनाओं में भी प्रदेश के टाप-10 प्रदेशों में शामिल है। मप्र का सातवां नंबर है।
मप्र में हर दिन मारी जा रही एक पलक और ट्विशा
एनसीआरबी की रिपोर्ट के मुताबिक मप्र में दहेज हत्या के 451 मामले सामने आए। उप्र में 2057 और बिहार में 1078 मामले सामने आए। मप्र में औसतन हर दिन एक दहेज हत्या हो रही है। हर रोज एक पलक और ट्विशा मारी जा रही हैं।
ससुराल में ही निभाना है, सोच से बाहर आने की जरूरत
अब भी लोक लाज और ससुराल में ही निभाना है, जैसे सामाजिक दबाव के कारण अक्सर बेटी की प्रताड़ना को माता-पिता भी अनदेखा कर देते हैं। नतीजन ससुराल पक्ष के हौंसले बुलंद होते हैं और मानसिक व शारीरिक प्रताड़ना बढ़ती जाती है।
