योजना के तहत किए गए परीक्षणों का भुगतान शासन स्तर से लंबित होने के कारण कंपनी ने पिछले वर्ष अक्टूबर से आयुष्मान कार्डधारी मरीजों की जांच बंद कर दी थी। …और पढ़ें

Publish Date: Thu, 28 May 2026 09:08:31 AM (IST)Updated Date: Thu, 28 May 2026 09:09:06 AM (IST)

जिला अस्पताल में 7 महीने बाद फिर शुरू हुई मुफ्त एमआरआई जांच, एसीएस के दखल से सुलझा मामला
जिला अस्पताल  स्थित  एमआरआई  सेंटर। नईदुनिया

HighLights

  1. सुविधा बंद होने से गरीब मरीज थे बेहाल
  2. भुगतान अटकने से बंद थी सुविधा
  3. पीपीपी मॉडल से स्थापति हुआ था सेंटर

नईदुनिया प्रतिनिधि, ग्वालियर। जिला अस्पताल मुरार में आयुष्मान कार्डधारी मरीजों के लिए निश्शुल्क एमआरआई जांच सेवा सात माह बाद फिर शुरू हो गई है। लंबे समय से बंद पड़ी इस सुविधा के कारण मरीजों को निजी सेंटरों के चक्कर लगाने पड़ रहे थे और महंगी जांच का आर्थिक बोझ उठाना पड़ रहा था। शासन स्तर पर हस्तक्षेप और वरिष्ठ अधिकारियों की नाराजगी के बाद मरीजों को राहत मिली है।

उल्लेखनीय है कि मुरार जिला अस्पताल में पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) मॉडल के तहत कृष्णा डायग्नोस्टिक लिमिटेड द्वारा करीब 13 करोड़ रुपये की लागत से एमआरआई सेंटर स्थापित किया गया था। सेंटर शुरू होने के बाद आयुष्मान योजना के मरीजों को अस्पताल में ही निश्शुल्क एमआरआई जांच की सुविधा मिलने लगी थी। योजना के तहत किए गए परीक्षणों का भुगतान शासन स्तर से लंबित होने के कारण कंपनी ने पिछले वर्ष अक्टूबर से आयुष्मान कार्डधारी मरीजों की जांच बंद कर दी थी।

एसीएस वर्णवाल के निर्देश के बाद शुरू हुई सुविधा

हाल ही में ग्वालियर दौरे पर पहुंचे अपर मुख्य सचिव (एसीएस) अशोक वर्णवाल को जब एमआरआइ जांच सेवा बंद होने की जानकारी मिली तो उन्होंने भोपाल स्तर के अधिकारियों से चर्चा कर जल्द सेवा बहाल करने के निर्देश दिए थे। इसके बाद कृष्णा डायग्नोस्टिक लिमिटेड ने आयुष्मान योजना के तहत जांच दोबारा शुरू कर दी।

कंपनी ने सिविल सर्जन को सौंपा पत्र

कंपनी ने सिविल सर्जन डा. आरके शर्मा को पत्र सौंपकर जांच सुविधा दोबारा शुरू किए जाने की जानकारी दी गई। हालांकि सेवा शुरू हो गई है, लेकिन कंपनी का बकाया भुगतान अभी भी लंबित बताया जा रहा है।

जांच नहीं होने से प्रभावित हो रहा था उपचार: महंगी एमआरआइ जांच के कारण कई मरीज समय पर जांच नहीं करा पा रहे थे, जिससे उनके उपचार में भी देरी हो रही थी। आर्थिक रूप से कमजोर मरीजों के लिए यह स्थिति सबसे ज्यादा परेशानी भरी साबित हो रही थी।



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