मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए दुष्कर्म के कारण गर्भवती हुई एक नाबालिग लड़की को गर्भपात कराने की अनुमति प्रदान कर दी है। अदालत ने अपने निर्णय के दौरान इस बात पर गहरी चिंता व्यक्त की है कि पीड़िता और उसके परिवार को निचली अदालत से राहत नहीं मिल सकी, जिसके कारण उन्हें उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाना पड़ा। न्यायमूर्ति ने निचली अदालतों के लिए विशेष दिशा-निर्देश जारी करते हुए कहा कि भविष्य में ऐसे मामलों में विशेष पॉक्सो कोर्ट स्वयं कानून और मानक संचालन प्रक्रिया का पालन करते हुए गर्भपात की अनुमति दे सकते हैं। इस व्यवस्था से पीड़िताओं को अनावश्यक रूप से उच्च न्यायालय तक आने की बाध्यता नहीं रहेगी और उन्हें समय पर न्याय मिल सकेगा। 

यह पूरा मामला रतलाम जिले से संबंधित है, जहां जनवरी 2022 में 16 वर्षीय नाबालिग के साथ दुष्कर्म की घटना घटित हुई थी। पुलिस ने आरोपी के विरुद्ध भारतीय दंड संहिता की धारा 376, 506 और पॉक्सो अधिनियम के तहत प्रकरण दर्ज किया था। घटना के पश्चात बालिका गर्भवती हो गई थी, जिसके संबंध में मार्च 2022 में औद्योगिक थाना रतलाम में प्राथमिकी दर्ज कराई गई थी।

निचली अदालत में क्षेत्राधिकार का हवाला देकर खारिज हुई थी अर्जी 

पीड़िता की माता ने सबसे पहले विशेष पॉक्सो कोर्ट से गर्भपात की अनुमति के लिए गुहार लगाई थी। पीड़िता के एडवोकेट नीरज सोनी ने अदालत में तर्क दिया गया था कि चूंकि बालिका नाबालिग है और दुष्कर्म की शिकार हुई है, इसलिए चिकित्सकीय गर्भ समापन अधिनियम, 1971 के प्रावधानों के तहत पंजीकृत डॉक्टरों को गर्भपात की अनुमति देनी चाहिए। हालांकि, निचली अदालत ने इसे अपने क्षेत्राधिकार से बाहर बताते हुए आवेदन को निरस्त कर दिया था। इस निर्णय के विरुद्ध पीड़िता के पक्ष ने हाईकोर्ट की इंदौर बेंच में पुनरीक्षण याचिका दायर की। याचिका में निचली अदालत के आदेश को रद्द करने के साथ-साथ ऐसे संवेदनशील मामलों में अधीनस्थ न्यायालयों के लिए स्पष्ट गाइडलाइन जारी करने की मांग की गई थी ताकि भविष्य में किसी अन्य पीड़िता को इस तरह की कानूनी पेचीदगियों का सामना न करना पड़े।

हाईकोर्ट ने निचली अदालतों को दिए निर्देश 

हाईकोर्ट ने मामले की विस्तृत सुनवाई के बाद दिसंबर 2025 में अपना आदेश जारी किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि इस तरह के प्रकरण न्यायालय के समक्ष आते हैं, तो वे चिकित्सकीय गर्भ समापन अधिनियम और उसके संशोधित नियमों के अंतर्गत पंजीकृत चिकित्सकों को प्रक्रिया आगे बढ़ाने के निर्देश दे सकते हैं। कोर्ट ने आदेश में इस बात पर जोर दिया कि निर्धारित मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) का कड़ाई से पालन किया जाए। साथ ही, पूर्व के महत्वपूर्ण न्यायिक उदाहरणों में दिए गए निर्देशों को भी ध्यान में रखने को कहा गया है। इस फैसले के बाद अब विचारण न्यायालय एमटीपी एक्ट के दायरे में रहकर सीधे डॉक्टरों को आदेश जारी करने में सक्षम होंगे।

न्यायिक टिप्पणी में किया पीड़िता की मानसिक वेदना का उल्लेख

सुनवाई के दौरान अदालत ने अत्यंत संवेदनशील टिप्पणी करते हुए कहा कि गर्भपात की प्रक्रिया स्वयं में मानसिक और शारीरिक रूप से कष्टदायक होती है। ऐसी स्थिति में पीड़िता को बार-बार अदालतों के चक्कर लगवाना और आर्थिक बोझ डालना उसकी पीड़ा को और अधिक बढ़ाने जैसा है। न्यायालय ने कठिन परिस्थितियों में न्याय हेतु संघर्ष करने के लिए पीड़िता के परिजनों और उनके कानूनी सलाहकार एडवोकेट नीरज सोनी के प्रयासों की सराहना की। कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि डॉक्टरों और निचली अदालतों को ऐसे मामलों की गंभीरता को समझते हुए कानून सम्मत तरीके से त्वरित निर्णय लेने चाहिए ताकि देरी के कारण कोई अन्य जटिलता पैदा न हो।

मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट बनी फैसले का मुख्य आधार

इस मामले में रतलाम जिला अस्पताल की चिकित्सा समिति द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट अत्यंत निर्णायक रही। समिति की अध्यक्ष रतलाम एमसीएच यूनिट की स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. ममता शर्मा हैं। स्त्री रोग विशेषज्ञों की समिति ने अपनी जांच में पाया कि पीड़िता 14 सप्ताह की गर्भवती थी। मेडिकल रिपोर्ट में यह स्पष्ट किया गया कि लड़की के कानूनी अभिभावक की सहमति प्राप्त होने पर बिना किसी बड़े जोखिम के गर्भपात की प्रक्रिया संपन्न की जा सकती है। इसी स्वास्थ्य रिपोर्ट और कानूनी प्रावधानों को आधार बनाकर हाईकोर्ट ने पीड़िता को राहत प्रदान की और निचली अदालतों की कार्यप्रणाली को लेकर नए मानक तय किए।



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