नईदुनिया प्रतिनिधि, ग्वालियर। इस बार सरसों का तेल रसोई के बजट को बिगाड़ेगा। इसकी वजह ईरान-अमेरिका का युद्ध नहीं है, बल्कि सरसों का कम उत्पादन होना और मंडी में सरसों का सरकारी समर्थन मूल्य यानि एमएसपी से अधिक दर पर बिकना है। हालांकि सरसों के अधिक दर पर बिकने से किसानों को तो फायदा हो रहा है, लेकिन आमजन को तेल महंगा मिलेगा।
इस बार ग्वालियर सहित अंचल के जिलों में सरसों का उत्पादन कम हुआ है। ऐसे में मंडी में सरसों ऊंचे दामों पर बिक रही है। यहां बता दें कि सरकार ने सरसों का सरकारी समर्थन मूल्य 62 सौ रुपये प्रति क्विंटल तय किया है, जबकि अंचल की मंडियों में सरसों 68 सौ से सात हजार रुपये प्रति क्विंटल बिक रही है। यानि एमएसपी से ये भाव छह से आठ सौ रुपये अधिक है।
मौसम की मार से 40 प्रतिशत गिरा उत्पादन
ग्वालियर-चंबल को सरसों यानि पीले सोने की खान कहा जाता है। लेकिन इस बार सरसों को बार-बार मौसम की मार झेलनी पड़ी है। पहले तो मानसून ज्यादा दिनों तक सक्रिय रहा, जिसकी वजह से सरसों की बुवाई कम हो पाई। इसके बाद सरसों में पाला (पोलियो) रोग भी लगा और कटाई के समय भी वर्षा हो गई। जिससे सरसों का उत्पादन 40 प्रतिशत तक गिर गया है। ऐसे में सरसों का उत्पादन कम हुआ तो मंडी में भी आवक कम पहुंची। मंडी से जुड़े कारोबारियों का कहना है कि सरसों के भाव और बढ़ सकते हैं।
भावांतर योजना की नहीं पड़ी जरूरत
पहली बार सरसों के लिए सरकार भावांतर योजना लाई, लेकिन इस बार उसकी जरूरत ही नहीं पड़ी। अक्सर सरसों जब मंडी में आती थी तो दाम सरकारी समर्थन मूल्य से नीचे रहते थे, जिससे किसानों को नुकसान होता था। इसलिए प्रदेश सरकार ने इस बार सरसों को भावांतर योजना में शामिल किया। जिले के भी दो हजार किसानों ने इस योजना में पंजीयन कराया। लेकिन मंडी में सरसों एमएसपी से अधिक पर बिक रही है, ऐसे में भावांतर योजना की किसानों को जरूरत ही नहीं पड़ रही है।
170 रुपये प्रति किलो तक पहुंच सकते हैं दाम
बाजार में वर्तमान में सरसों का तेल 150 से 160 रुपये किलो के करीब चल रहा है। लेकिन अब नई फसल आने के बाद भी सरसों महंगे दामों पर बिक रही है, तो इसका सीधा असर सरसों तेल पर पड़ेगा। ऐसे में सरसों तेल के दाम बढ़ जाएंगे। कारोबारियों का कहना है कि आने वाले समय में सरसों का तेल 160 से 170 रुपये तक पहुंच सकता है। इससे आम आदमी की जेब पर अतिरिक्त बोझ पड़ना तय है।
सरसों के अभाव में बंद हो सकती हैं इकाइयां
ग्वालियर-चंबल में सरसों की फसल होने से मस्टर्ड ऑयल की कई इकाइयां हैं। ये इकाइयां अपनी जरूरत के मुताबिक मंडियों से सरसों की खरीद कर लेती हैं। लेकिन इस बार मंडी में सरसों कम आ रही है, ऐसे में सभी इकाइयों को पूरे साल के लिए सरसों मिल पाएगी, यह कहना मुश्किल होगा। वैसे ही मुरैना जैसे क्षेत्र में आधी से अधिक मस्टर्ड ऑयल की इकाइयां पहले से ही सरसों के अभाव में बंद थीं। ऐसे में यदि अभी भी पर्याप्त सरसों नहीं मिली तो इन इकाइयों का शुरू होना मुश्किल होगा और इनमें काम करने वाले वर्करों के सामने भी समस्या खड़ी हो जाएगी।
किसानों को मिल रहा है सीधा लाभ
सरसों को सरकार ने भावांतर योजना में इसलिए शामिल किया था जिससे किसानों की फसल यदि एमएसपी से कम पर बिके तो उन्हें नुकसान न हो। लेकिन इस बार उत्पादन कम होने से सरसों महंगी है। ऐसे में किसानों को भावांतर योजना से कोई लाभ नहीं मिलेगा, क्योंकि उन्हें मंडी में ही बेहतर दाम मिल रहे हैं। – आर.बी.एस. जाटव, उप संचालक, कृषि
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