मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि किसी अन्य राज्य से जारी अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) प्रमाण पत्र के …और पढ़ें

Publish Date: Wed, 01 Apr 2026 10:49:01 PM (IST)Updated Date: Wed, 01 Apr 2026 10:49:01 PM (IST)

दूसरे राज्य के OBC प्रमाण पत्र पर मध्य प्रदेश में नहीं मिलेगा आरक्षण, MP हाई कोर्ट का बड़ा फैसला
MP हाई कोर्ट

HighLights

  1. मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने दूसरे राज्य के ओबीसी प्रमाण पत्र को किया अमान्य
  2. विवाह के बाद पति की जाति के आधार पर नहीं मिलता महिला को आरक्षण का लाभ
  3. शिक्षक पात्रता परीक्षा में उत्तर प्रदेश की अभ्यर्थी का चयन रद्द करने का फैसला सही

नईदुनिया प्रतिनिधि, ग्वालियर। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि किसी अन्य राज्य से जारी अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) प्रमाण पत्र के आधार पर मध्य प्रदेश में आरक्षण का लाभ नहीं लिया जा सकता। साथ ही कोर्ट ने यह भी साफ किया कि विवाह के बाद महिला को पति की जाति के आधार पर आरक्षण का अधिकार नहीं मिलता। यह मामला अर्चना दांगी से जुड़ा है, जो मूल रूप से उत्तर प्रदेश के जालौन की रहने वाली हैं। उन्होंने वर्ष 2018 की उच्च माध्यमिक शिक्षक पात्रता परीक्षा उत्तीर्ण की थी, लेकिन दस्तावेज सत्यापन के दौरान उनका चयन रद्द कर दिया गया। कारण यह था कि उनका ओबीसी प्रमाण पत्र उत्तर प्रदेश से जारी हुआ था।

विवाह के बाद निवास परिवर्तन पर आरक्षण का तर्क

याचिकाकर्ता की ओर से तर्क दिया गया कि दांगी जाति दोनों राज्यों में ओबीसी सूची में शामिल है और विवाह के बाद वे मध्य प्रदेश की निवासी बन चुकी हैं, इसलिए उन्हें आरक्षण का लाभ मिलना चाहिए। वहीं राज्य सरकार ने अदालत में कहा कि जाति का निर्धारण जन्म से होता है, न कि विवाह या निवास परिवर्तन से। साथ ही, दूसरे राज्य का जाति प्रमाण पत्र मध्य प्रदेश में मान्य नहीं होता। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि यह विषय पहले भी सुप्रीम कोर्ट सहित विभिन्न न्यायालयों द्वारा स्पष्ट किया जा चुका है।

जाति का निर्धारण जन्म से, विवाह से नहीं

कोर्ट ने दोहराया कि कोई भी व्यक्ति दूसरे राज्य में जाकर अपनी जाति के आधार पर आरक्षण का लाभ नहीं ले सकता, चाहे वह जाति उस राज्य की सूची में शामिल ही क्यों न हो। इसके अलावा, न्यायालय ने यह भी कहा कि विवाह के बाद सामाजिक पहचान में बदलाव संभव है, लेकिन आरक्षण का अधिकार जन्म आधारित सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन पर निर्भर करता है, इसलिए इसमें बदलाव नहीं माना जाएगा। इन्हीं तथ्यों के आधार पर हाई कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए संबंधित अधिकारियों के निर्णय को सही ठहराया।

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