कृषि विभाग के वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी रहे डॉ. राधाकृष्ण शर्मा की पदोन्नति से जुड़े मामले में हाईकोर्ट ने कहा कि अधिकार व्यक्ति के साथ खत्म नहीं होते …और पढ़ें

HighLights
- हाईकोर्ट ने कहा अधिकार मृत्यु के बाद भी कायम
- 2002 से पदोन्नति लाभ परिवार को देने के निर्देश
- विभागीय गलती पर “नो वर्क-नो पे” लागू नहीं
नईदुनिया प्रतिनिधि, ग्वालियर। ग्वालियर हाईकोर्ट की एकल पीठ ने एक महत्वपूर्ण आदेश दिया है। कृषि विभाग के वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी रहे डॉ. राधाकृष्ण शर्मा की पदोन्नति से जुड़े मामले में हाईकोर्ट ने कहा कि अधिकार व्यक्ति के साथ खत्म नहीं होते। डॉ. शर्मा के निधन के बाद उनकी पदोन्नति के 2002 के लाभ उनके स्वजन को दिया जाए।
जूनियर को मिला प्रमोशन, वरिष्ठ रह गए वंचित
डॉ. राधाकृष्ण शर्मा अपने जूनियर अधिकारियों से वरिष्ठ थे, लेकिन वर्ष 2002 में जब पदोन्नतियां हुईं तो उनके जूनियर को प्रमोशन मिल गया, जबकि उनकी पदोन्नति रोक दी गई। विभाग ने इसके पीछे लंबित आपराधिक मामला और गोपनीय रिपोर्ट (एसीआर) को कारण बताया। हालांकि बाद में डॉ. शर्मा उस आपराधिक मामले में बरी हो गए, फिर भी उन्हें पदोन्नति नहीं दी गई।
18 साल चली कानूनी लड़ाई
न्याय के लिए डा. शर्मा ने वर्ष 2008 में हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया, लेकिन 18 वर्ष लंबी कानूनी लड़ाई के दौरान उनका निधन हो गया। इसके बाद उनके पुत्र रमन शर्मा ने मामले को आगे बढ़ाया।
हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि यदि किसी कर्मचारी की पदोन्नति विभागीय गलती से रोकी जाती है तो उसे पूरा लाभ मिलना चाहिए। “नो वर्क-नो पे” का सिद्धांत ऐसे मामलों में लागू नहीं होगा। बिना बताए गए एसीआर को पदोन्नति का आधार बनाना कानून के खिलाफ है और यह संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है।
कोर्ट का अंतिम आदेश
कोर्ट ने निर्देश दिया कि डॉ. राधाकृष्ण शर्मा को 28 अक्टूबर 2002 से पदोन्नत माना जाए और उसी तारीख से सभी एरियर, वेतन, वरिष्ठता और अन्य लाभ दिए जाएं। यह पूरी राशि उनके परिवार को दी जाए। कोर्ट ने माना कि पदोन्नति न मिलना डा. शर्मा की गलती नहीं, बल्कि विभाग की लापरवाही थी।
