एक महत्वपूर्ण फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि मध्य प्रदेश लोकायुक्त की जांच शाखा स्पेशल पुलिस एस्टैब्लिशमेंट (SPE) कोई खुफिया या सुरक्षा संगठन नहीं है, इसलिए इसे सूचना का अधिकार अधिनियम के दायरे से बाहर नहीं रखा जा सकता। न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और ए.एस. चंदूरकर की पीठ ने मध्य प्रदेश सरकार की 25 अगस्त 2011 की अधिसूचना को रद्द कर दिया। इस अधिसूचना के जरिए SPE को आरटीआई कानून के दायरे से बाहर किया गया था। अदालत ने इसे कानून के विपरीत और अत्यधिक बताया।
क्या कहा कोर्ट ने?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जिस कानूनी व्यवस्था के तहत SPE का गठन हुआ है और लोकायुक्त तथा उप-लोकायुक्त को जो अधिकार दिए गए हैं, उन्हें देखते हुए SPE को खुफिया या सुरक्षा संगठन नहीं कहा जा सकता। यह संस्था केवल उन मामलों में लोकायुक्त और उप-लोकायुक्त की सहायता करती है, जो मध्य प्रदेश लोकायुक्त एवं उप-लोकायुक्त अधिनियम, 1981 की धारा 7 के अंतर्गत आते हैं।
अदालत ने स्पष्ट किया कि खुफिया और सुरक्षा से जुड़े मामलों की जांच का अधिकार न तो लोकायुक्त को है और न ही उप-लोकायुक्त को। राज्य सरकार द्वारा समय-समय पर जारी अधिसूचनाएं मुख्य रूप से भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 409 (आपराधिक न्यासभंग), धारा 420 (धोखाधड़ी) और लोकसेवकों से जुड़े अन्य अपराधों तक सीमित हैं।
पीठ ने कहा कि आरटीआई अधिनियम की धारा 24(4) के तहत राज्य सरकार केवल उन्हीं खुफिया और सुरक्षा संगठनों को अधिसूचना द्वारा छूट दे सकती है, जो वास्तव में ऐसे कार्य करते हों। SPE को खुफिया या सुरक्षा संबंधी अपराधों की जांच का अधिकार ही नहीं है, इसलिए उसे इस श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। अदालत ने कहा कि SPE का कार्यक्षेत्र केवल लोकायुक्त या उप-लोकायुक्त द्वारा जांच योग्य मामलों तक सीमित है और इसका संबंध मुख्य रूप से लोकसेवकों के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों से है।
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इसी आधार पर अदालत ने 25 अगस्त 2011 की अधिसूचना को रद्द करते हुए कहा कि यह RTI अधिनियम की धारा 24(4) के अनुरूप नहीं है। हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि उसने इस अधिसूचना की वैधता को राज्य आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो के संदर्भ में नहीं परखा है, इसलिए उस सीमा तक अधिसूचना प्रभावी रहेगी। यह मामला कटनी के तत्कालीन थाना प्रभारी कमता प्रसाद मिश्रा से जुड़ा था। SPE भोपाल ने उनके खिलाफ ट्रैप कार्रवाई के बाद 11 अप्रैल 2017 को एफआईआर दर्ज की थी। बाद में 20 मई 2020 को अभियोजन स्वीकृति दी गई।
मिश्रा ने अभियोजन स्वीकृति दिए जाने की निर्णय प्रक्रिया से संबंधित जानकारी RTI के तहत मांगी थी, लेकिन SPE और बाद में राज्य सूचना आयोग ने यह जानकारी देने से इनकार कर दिया। इसके बाद मामला हाई कोर्ट पहुंचा, जहां जानकारी उपलब्ध कराने का आदेश दिया गया। हाई कोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए SPE सुप्रीम कोर्ट पहुंची थी। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि किसी अधीनस्थ कानून की वैधता पर सवाल उठता है, तो अदालत स्वयं भी उसकी जांच कर सकती है, भले ही याचिका में उसे रद्द करने की विशेष मांग न की गई हो। हालांकि संबंधित प्राधिकरण को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाना चाहिए।
