अचलेश्वर महादेव सार्वजनिक न्यास मामले में हाईकोर्ट ने जिला न्यायालय का 2022 का आदेश निरस्त कर दिया। छह माह में दोबारा सुनवाई, चुनाव कराने और प्रकरण नि …और पढ़ें

Publish Date: Wed, 17 Jun 2026 09:04:32 AM (IST)Updated Date: Wed, 17 Jun 2026 09:04:32 AM (IST)

अचलेश्वर महादेव न्यास में जल्द होगा चुनाव, वित्तीय लेन-देन में गड़बड़ियों के लगे थे आरोप
अचलेश्वर महादेव सार्वजनिक न्यास। (फाइल फोटो)

HighLights

  1. हाईकोर्ट ने जिला न्यायालय का 2022 आदेश निरस्त किया।
  2. अचलेश्वर महादेव न्यास मामले में दोबारा सुनवाई होगी अब।
  3. छह माह के भीतर प्रकरण निपटाने के निर्देश दिए।

नईदुनिया प्रतिनिधि, ग्वालियर। अचलेश्वर महादेव सार्वजनिक न्यास के प्रबंधन और संपत्तियों में कथित अनियमितताओं से जुड़े मामले में मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।

हाईकोर्ट ने जिला न्यायालय द्वारा वर्ष 2022 में पारित उस आदेश को निरस्त कर दिया है, जिसमें पब्लिक ट्रस्ट रजिस्ट्रार द्वारा प्रस्तुत प्रकरण को खारिज कर दोबारा जांच के लिए भेज दिया गया था। अदालत ने मामले की दोबारा सुनवाई के निर्देश देते हुए छह माह के भीतर प्रकरण का निराकरण करने को कहा है।

नियमों के अनुरूप नहीं चल रहा न्याय का संचालन

  • मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति आशीष श्रोती ने की। प्रकरण की शुरुआत तब हुई थी, जब सामाजिक कार्यकर्ता संतोष सिंह राठौर ने अचलेश्वर महादेव सार्वजनिक न्यास के संचालन, संपत्तियों के प्रबंधन और वित्तीय लेन-देन में गड़बड़ियों की शिकायत की थी।
  • शिकायत में आरोप लगाया गया था कि न्यास का संचालन नियमों के अनुरूप नहीं हो रहा है और इसकी संपत्तियों तथा धनराशि का उचित प्रबंधन नहीं किया जा रहा। हाईकोर्ट के निर्देश पर पब्लिक ट्रस्ट रजिस्ट्रार ने मामले की जांच कराई थी।

  • जांच के दौरान संयुक्त संचालक कोष एवं लेखा विभाग की रिपोर्ट में वित्तीय अनियमितताओं की ओर संकेत किया गया। इसके आधार पर रजिस्ट्रार ने मध्यप्रदेश पब्लिक ट्रस्ट अधिनियम की धारा 26 के तहत जिला न्यायालय में आवेदन प्रस्तुत कर आवश्यक दिशा-निर्देश मांगे थे।
  • 2017 में हुआ था अंतिम चुनाव

    सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि न्यास की निर्वाचित कार्यकारिणी का कार्यकाल दो वर्ष का था और अंतिम चुनाव वर्ष 2017 में हुए थे। इस प्रकार कार्यकारिणी का कार्यकाल 2019 में ही समाप्त हो चुका था। इसके बावजूद नई कार्यकारिणी का गठन नहीं हुआ। अदालत ने कहा कि ऐसी स्थिति में पूर्व पदाधिकारियों को सुनवाई का अवसर नहीं मिलने को आधार बनाकर पूरे मामले को खारिज करना उचित नहीं था।

    जल्द कराएं जाएं न्यास का चुनाव

    • कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि सार्वजनिक न्यासों की संपत्तियां समाज और धार्मिक उद्देश्यों के लिए होती हैं। इसलिए न्यायालय और पब्लिक ट्रस्ट प्रशासन का दायित्व है कि वे इन संपत्तियों को दुरुपयोग और अव्यवस्था से बचाएं।
    • अदालत ने माना कि जिला न्यायालय ने मामले के मूल तथ्यों और आरोपों पर विचार करने के बजाय तकनीकी आधारों पर फैसला दिया, जो न्यायसंगत नहीं था। हाईकोर्ट ने जिला न्यायालय का आदेश निरस्त करते हुए मामले को दोबारा सुनवाई के लिए भेज दिया है। साथ ही निर्देश दिए हैं कि न्यास के चुनाव जल्द कराए जाएं और प्रकरण का शीघ्र निराकरण किया जाए।



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