प्रदेश के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल हमीदिया में किडनी मरीजों के इलाज की व्यवस्था खुद वेंटिलेटर पर नजर आ रही है। यहां डायलिसिस यूनिट में लगी अधिकांश मशीनें 12 से 15 साल पुरानी हो चुकी हैं और अपनी निर्धारित उम्र से कहीं ज्यादा काम कर चुकी हैं। हालत यह है कि 13 मशीनों में से सिर्फ 8 मशीनें ही चालू हैं, जबकि 5 मशीनें पूरी तरह बंद पड़ी हैं। मशीनों के पार्ट्स बाजार में उपलब्ध नहीं होने के कारण मेंटेनेंस कंपनियों ने भी इन्हें सुधारने से हाथ खड़े कर दिए हैं।

सिर्फ 8 मशीनों पर मरीजों का बोझ

हमीदिया अस्पताल भोपाल ही नहीं, बल्कि सीहोर, रायसेन, विदिशा, राजगढ़, नर्मदापुरम और आसपास के जिलों के मरीजों के लिए भी सबसे बड़ा सरकारी केंद्र है। किडनी रोगियों को सप्ताह में दो से तीन बार डायलिसिस कराना पड़ता है, लेकिन मशीनों की कमी के कारण सभी मरीजों को सुविधा उपलब्ध नहीं हो पा रही है। डायलिसिस का एक सत्र निजी अस्पतालों में करीब दो हजार रुपये या उससे अधिक का पड़ता है। आर्थिक रूप से कमजोर मरीजों के लिए सरकारी अस्पताल ही एकमात्र सहारा है, लेकिन यहां क्षमता सीमित होने के कारण चुनिंदा मरीजों को ही नियमित डायलिसिस मिल पाता है। बाकी मरीजों को दूसरे अस्पतालों में रेफर किया जाता है।

पांच साल से मांग, फिर भी नहीं मिली नई मशीनें

जानकारी के अनुसार डायलिसिस विभाग पिछले पांच वर्षों से लगातार हर साल 10 नई मशीनों की मांग कर रहा है, लेकिन गांधी मेडिकल कॉलेज प्रबंधन अब तक मशीनें उपलब्ध नहीं करा पाया। नतीजतन पुरानी मशीनों पर लगातार बढ़ता दबाव मरीजों के लिए खतरा बनता जा रहा है।

डॉक्टर बोले- समय सीमा से ज्यादा चल चुकी हैं मशीनें

विभाग के डॉ. हिमांशु शर्मा ने बताया कि मशीनें काफी पुरानी हो चुकी हैं, इसलिए समय-समय पर तकनीकी दिक्कतें आती रहती हैं। उन्होंने स्वीकार किया कि अस्पताल में लगी मशीनें अपनी निर्धारित समयावधि से अधिक काम कर चुकी हैं। विभाग ने 10 नई मशीनों की मांग भेजी है और उम्मीद है कि जल्द नई मशीनें उपलब्ध कराई जाएंगी।

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मशीनों की उम्र हो चुकी पूरी

स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार किसी भी डायलिसिस मशीन का सामान्य जीवनकाल लगभग 7 से 10 वर्ष या 15 से 20 हजार घंटे के उपयोग तक माना जाता है। नियमित रखरखाव से मशीनों की कार्यक्षमता बढ़ सकती है, लेकिन तकनीकी उन्नयन और सुरक्षा मानकों को देखते हुए कई अस्पताल 5 से 7 साल बाद ही मशीनें बदलना शुरू कर देते हैं। ऐसे में हमीदिया की 12 से 15 साल पुरानी मशीनों का इस्तेमाल चिंता बढ़ाने वाला है।

जिम्मेदारों ने झाड़ा पल्ला

जब इस संबंध में हमीदिया अस्पताल के अधीक्षक डॉ. सुमित टंडन से बात की गई तो उन्होंने कहा कि यह मामला उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं आता और इस बारे में डीन से चर्चा की जाए। वहीं गांधी मेडिकल कॉलेज के डीन से संपर्क करने की कोशिश की गई, लेकिन उनकी ओर से कोई जवाब नहीं मिला।

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हर दिन बढ़ रहा जोखिम

जो 8 मशीनें फिलहाल काम कर रही हैं, वे भी अक्सर तकनीकी खराबी का शिकार हो जाती हैं। मशीन बंद होते ही मरीजों की पूरी शेड्यूलिंग प्रभावित होती है और कई मरीजों को इंतजार या रेफरल का सामना करना पड़ता है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि प्रदेश के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल में जीवनरक्षक डायलिसिस सेवाएं आखिर कब तक पुरानी और जवाब दे चुकी मशीनों के भरोसे चलती रहेंगी।

 



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