राजधानी भोपाल में प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत पक्के घर का सपना देखने वाले हजारों हितग्राही अब संकट में हैं। वर्षों पहले आवेदन कर अपनी हिस्सेदारी जमा करने के बावजूद उन्हें आज तक मकानों का कब्जा नहीं मिल पाया है। हालात ऐसे बन गए हैं कि राहत देने वाली यह योजना अब आर्थिक दबाव और मानसिक तनाव का कारण बनती जा रही है। लगातार देरी और अधूरे प्रोजेक्ट्स ने लोगों की उम्मीदों को झटका दिया है।
EMI और किराया,दोहरी मार से बिगड़ा संतुलन
मकान समय पर नहीं मिलने के कारण हितग्राही दोहरी मार झेल रहे हैं। एक तरफ बैंक से लिया गया लोन और उसकी EMI है, तो दूसरी ओर किराए के मकानों में रहने का खर्च। सीमित आय वाले परिवारों के लिए यह स्थिति बेहद कठिन हो गई है। घर का बजट गड़बड़ा गया है और कई परिवारों को रोजमर्रा की जरूरतों में कटौती करनी पड़ रही है।
अधूरे लक्ष्य, धीमी रफ्तार
हाउसिंग फॉर ऑल के तहत भोपाल में 21 प्रोजेक्ट शुरू किए गए थे, जिनमें 11,457 मकान बनाकर देने का लक्ष्य रखा गया था। लेकिन करीब 9 साल बाद भी सिर्फ 6,573 मकान ही पूरे हो पाए हैं। यानी आधे से ज्यादा काम अब भी अधूरा है। करीब 40 प्रतिशत प्रोजेक्ट बीच में ही रुक गए हैं, जबकि बाकी प्रोजेक्ट्स की रफ्तार बेहद धीमी बनी हुई है, जिससे समयसीमा लगातार आगे खिसकती जा रही है।
अधूरे ढांचे और अधूरी सुविधाएं
शहर के कई हिस्सों में प्रोजेक्ट्स की स्थिति चिंताजनक है। अरेरा कॉलोनी 12 नंबर स्टॉप, गंगा नगर/श्याम नगर और राहुल नगर-2 जैसे प्रोजेक्ट तय समयसीमा से कई साल पीछे चल रहे हैं। कई जगह इमारतें तो खड़ी हो गई हैं, लेकिन वहां पानी, बिजली, सड़क और सीवरेज जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं। कुछ जगहों पर निर्माण कार्य पूरी तरह ठप पड़ा है।
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हितग्राहियों की आवाज
हितग्राही- दुष्यंत सिंह ने बताया कि 2021 में 9 लाख जमा करने के बाद भी मकान नहीं मिला, जबकि 2017 से प्रोजेक्ट चल रहा है। उन्होंने बताया कि 1BHK वालों की स्थिति सबसे खराब है, 2 और 3 BHK वालों को पजेशन मिल गया, लेकिन वे अभी भी किराया और EMI दोनों भर रहे हैं।
हितग्राही- अरविंद बबेले ने बताया कि 8-10 साल से बिल्डिंग बन रही है, लेकिन अभी तक तैयार नहीं हुई। उन्होंने बताया कि बाद में शुरू हुए 2BHK और 3BHK मकान बनकर मिल गए, लेकिन वे नगर निगम के चक्कर काटते रह गए और कोई सुनवाई नहीं हुई।
हितग्राही- अरुणा राय पवार ने बताया कि 2021 में पैसा जमा किया, लेकिन आज तक मकान नहीं मिला। उन्होंने बताया कि किराया अलग देना पड़ रहा है और लोन की किस्त भी भरनी पड़ रही है, शिकायत के बाद भी सिर्फ आश्वासन मिलते हैं।
हितग्राही- अवधेश प्रताप सिंह ने बताया कि मकान की रजिस्ट्री होने के बाद भी कई साल से इंतजार कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि कई बार प्रदर्शन और शिकायत के बावजूद सुनवाई नहीं हुई और बिना पहुंच वाले लोगों को बार-बार घुमाया जा रहा है।
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देरी के कारण, सिस्टम पर सवाल
अधिकारियों के मुताबिक प्रोजेक्ट्स में देरी की वजह रेरा से मंजूरी मिलने में समय लगना, ठेकेदारों की लापरवाही, भुगतान में अड़चन और एजेंसियों के बीच समन्वय की कमी है। हालांकि, इन कारणों का सीधा असर हितग्राहियों पर पड़ रहा है, जिनकी वर्षों की मेहनत और जमा पूंजी दांव पर लगी हुई है। बीते वर्षों में कई अधिकारी बदले, लेकिन हालात में कोई बड़ा सुधार नजर नहीं आया। हर बार नए आश्वासन जरूर मिले, लेकिन जमीन पर प्रगति बेहद धीमी रही। हितग्राहियों का कहना है कि उनकी समस्याओं को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा और जिम्मेदारी तय करने से बचा जा रहा है।
