विश्व प्रसिद्ध श्री महाकालेश्वर मंदिर में गर्मी के मौसम को ध्यान में रखते हुए एक विशेष परंपरा का निर्वहन किया जा रहा है। इस परंपरा के तहत भस्म आरती के बाद से संध्या आरती तक बाबा महाकाल का निरंतर जलाभिषेक किया जा रहा है, ताकि उन्हें शीतलता प्रदान की जा सके।
मंदिर के पुजारी पंडित महेश शर्मा ने बताया कि यह परंपरा 29 जून (ज्येष्ठ पूर्णिमा) तक जारी रहेगी। इस दौरान प्रतिदिन सुबह 6 बजे से शाम 5 बजे तक सहस्त्रधारा के माध्यम से बाबा महाकाल का जलाभिषेक किया जाता है।
भस्म आरती के बाद शिवलिंग पर 11 नदियों के नाम पर मिट्टी के कलश (मटकियां) स्थापित किए गए हैं, जो अगले तीन माह तक वहीं रहेंगे। इन कलशों के माध्यम से गंगा, यमुना, सरस्वती, नर्मदा, सरयू, कावेरी, गोदावरी, महानदी, शिप्रा और ब्रह्मपुत्र जैसी पवित्र नदियों का प्रतीकात्मक जल भगवान को अर्पित किया जाता है।
पढ़ें: बार-बार बिजली कनेक्शन काटने से नाराज युवक बना हत्यारा, लीठ से पीट-पीटकर कर दी हत्या; गिरफ्तार
मंदिर के पुजारी पंडित आशीष गुरु के अनुसार, परंपरा के तहत वैशाख कृष्ण प्रतिपदा से ज्येष्ठ पूर्णिमा तक भगवान को शीतलता प्रदान करने के लिए रजत अभिषेक पात्र के साथ इन 11 कलशों से जलधारा प्रवाहित की जाती है। इस वर्ष अधिकमास (पुरुषोत्तम मास) होने के कारण यह अवधि एक माह बढ़कर कुल तीन माह की हो गई है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान शिव का निवास कैलाश पर्वत पर है, जहां सदैव शीतल वातावरण रहता है। इसी भावना के तहत गर्मी के मौसम में उन्हें ठंडक प्रदान करने के लिए यह विशेष जलाभिषेक किया जाता है।
प्रतिदिन सुबह 6 बजे शुरू होने वाली जलधारा शाम 5 बजे तक निरंतर बहती रहती है। मंदिर के पुजारियों के अनुसार, भगवान के मस्तक पर रखी 11 मटकियों से रक्षा सूत्र के माध्यम से बूंद-बूंद जल गिरता है, जो उन्हें गर्मी और हलाहल की उष्णता से राहत देता है। साथ ही, इससे भक्तों को मनोवांछित फल की प्राप्ति होने की मान्यता भी है।
