कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि किसी भी व्यक्ति को केवल मांग करने भर से सरकारी जमीन नहीं दी जा सकती, इसके लिए किसी नीति, नियम या वैधानिक अधिकार का होना आवश्यक …और पढ़ें

HighLights
- उम्रकैद की सजा काट रहा है कैदी
- भरण-पोषण के नाम पर मांगी थी 2 हेक्टेयर जमीन
- सरकार की दलील- वन विभाग की है भूमि, आवंटन का कोई नियम या नीति नहीं
नईदुनिया प्रतिनिधि, ग्वालियर। आजीवन कारावास की सजा काट रहे एक बंदी द्वारा परिवार के भरण-पोषण के लिए सरकारी भूमि आवंटित करने की मांग को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने खारिज कर दिया। अदालत ने स्पष्ट कहा कि किसी भी व्यक्ति को केवल मांग करने भर से सरकारी जमीन नहीं दी जा सकती, इसके लिए किसी नीति, नियम या वैधानिक अधिकार का होना आवश्यक है।
न्यायमूर्ति मिलिंद रमेश फड़के की एकलपीठ के समक्ष कन्हैयालाल कुशवाह की याचिका पर सुनवाई हुई। याचिकाकर्ता ने ग्राम बेला स्थित 2.184 हेक्टेयर भूमि अपने परिवार के जीविकोपार्जन के लिए आवंटित करने की मांग की थी। उसका कहना था कि परिवार के भरण-पोषण के लिए कृषि भूमि उपलब्ध कराई जाए। राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि संबंधित भूमि वन भूमि के रूप में दर्ज है और नगर निगम सीमा के भीतर आती है, इसलिए उसका आवंटन नहीं किया जा सकता, साथ ही याचिकाकर्ता ने ऐसा कोई नियम या सरकारी नीति भी प्रस्तुत नहीं की, जिसके तहत आजीवन कारावास भुगत रहा व्यक्ति सरकारी भूमि पाने का अधिकार रखता हो।
सुनवाई के दौरान सरकार ने यह भी बताया कि याचिकाकर्ता अपनी पत्नी और बच्चों के हित में जमीन मांग रहा है, जबकि वह स्वयं अपनी पत्नी की हत्या के मामले में दोषसिद्ध होकर आजीवन कारावास की सजा काट रहा है। ऐसे में उसकी मांग प्रथम दृष्टया ही सद्भावना से प्रेरित नहीं प्रतीत होती। हाईकोर्ट ने कहा कि किसी वैधानिक अधिकार के अभाव में राज्य को भूमि आवंटन के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। साथ ही यह भी माना कि जिस व्यक्ति को पत्नी की हत्या के अपराध में दोषी ठहराया जा चुका है, उसके द्वारा पत्नी के हित में भूमि आवंटन की मांग करना उसके दावे को और कमजोर करता है। इन्हीं टिप्पणियों के साथ अदालत ने याचिका को निराधार मानते हुए खारिज कर दिया।
