राज्यसभा चुनाव में मध्य प्रदेश से कांग्रेस की उम्मीदवार रहीं मीनाक्षी नटराजन के हार और नामांकन पत्र खारिज होने के साथ ही कांग्रेस विधायकों की बाड़ेबंदी को लेकर शुरू हुआ विवाद लगातार गहराता जा रहा है। इस पूरे घटनाक्रम के बीच कांग्रेस के हरदा से विधायक राम किशोर दोगने ने खुलकर अपनी नाराजगी जताई है।

राजनीतिक खेल खेलने का आरोप

अमर उजाला से खास बातचीत में उन्होंने कहा कि कांग्रेस विधायकों और उनके परिवारों को एयरपोर्ट पर करीब पांच घंटे तक इंतजार करना पड़ा, लेकिन वहां पीने के पानी और अन्य बुनियादी सुविधाओं तक की व्यवस्था नहीं थी। इस दौरान उन्होंने चुनाव में डमी फॉर्म नहीं भरे जाने को भी एक बड़ी चूक बताया है। वहीं चुनाव में भाजपा पर संख्या बल नहीं होने के बावजूद राजनीतिक खेल खेलने का आरोप लगाया। विधायक ने एयरपोर्ट पर हुई अव्यवस्था, फॉर्म रिजेक्ट होने, बाड़ेबंदी और भाजपा के आरोपों पर विस्तार से अपनी बात रखी। 

‘एयरपोर्ट पर नहीं थी व्यवस्था’

दोगने से बात करते हुए जब अमर उजाला के प्रतिनिधी ने उनकी नाराजगी को लेकर सवाल किया तो उन्होंने कहा कि अगर विधायक एयरपोर्ट लॉन पांच घंटे खड़े रहे तो यह बेइज्जती ही है। मैनेजमेंट ठीक तरीके से नहीं किया गया था। एयरलाइंस की ओर से भी बार-बार गुमराह किया जा रहा था। उन चीजों को हमारे लोगों ने भी ठीक से मैनेज नहीं किया, इसलिए मेरी नाराजगी थी। इसके साथ ही हमारा डमी फॉर्म भी नहीं भरा गया था। उन बातों को लेकर भी हमने चर्चा की थी। वह हमारी व्यक्तिगत बातें थीं। मैंने निश्चित रूप से नाराजगी व्यक्त की थी कि परिवार सहित लोग आ गए थे और उन्हें तकलीफ हो रही थी। यहां लॉन में बैठे हुए हैं और अंदर जाने तक की अनुमति नहीं मिल रही है। यह दुर्भाग्य है कि मध्य प्रदेश में भाजपा सरकार के दौरान विधायकों की ऐसी स्थिति हो रही है। भाजपा सरकार में लोगों को अंदर प्रवेश तक नहीं दिया जा रहा था।  

‘10 मिनट में अनुमति’ कहते-कहते निकल गए साढ़े चार घंटे

विधायक दोगने ने कहा कि हम लोगों को जब एयरपोर्ट पर इंतजार कराया जा रहा था उस वक्त हमारे नेता भी वहीं थे। एयरपोर्ट अथॉरिटी बार-बार हम लोगों को समझा रही थी कि 10 मिनट में आपकी अनुमति आ रही है। 10 मिनट में आ रही है, 10 मिनट में आ रही है। ऐसे करते-करते चार से सवा चार घंटे निकाल दिए गए। उसके बाद अंदर लिया गया। अंदर लेने के बाद भी हमें बोर्डिंग पास नहीं दिए गए। फिर बोर्डिंग पास देने में भी समय लगाया गया। जो टाइम पास सरकार एयरपोर्ट अथॉरिटी के जरिए करवा रही थी, वह गलत था। हमारा विरोध उसी बात को लेकर था। मैंने अपने लोगों से भी कहा था कि यह सब पहले से करा लेना चाहिए था। हम लोगों को यहां बुलाने की बजाय पहले सारी व्यवस्था कर लेनी चाहिए थी। उसके बाद बुलाते तो ज्यादा अच्छा रहता। विधायकों और चीफ सेक्रेटरी तक का प्रोटोकॉल होता है, लेकिन एयरपोर्ट में बैठाने तक की अनुमति नहीं दी जा रही थी। यह दुर्भाग्यपूर्ण है। अगर विधायकों की यह स्थिति है तो देश का क्या होगा? आने वाले समय में देश की क्या स्थिति बनेगी? अगर विधायकों के साथ ऐसा हो रहा है तो आम आदमी के साथ क्या होगा? मैंने उसी समय यह सारी बातें कही थीं।

बच्चों और परिवारों को झेलनी पड़ी परेशानी

दोगने ने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि वहां परिवार सहित लोग बाहर बैठे रहे। बाहर न पानी मिल रहा था और न ही कोई दूसरी व्यवस्था थी। हमने अपने लोगों से कहा कि आपको व्यवस्था तो करनी चाहिए थी। कम से कम अगर चार घंटे या पांच घंटे का समय लग रहा था तो लोगों के लिए पानी और खाने की व्यवस्था होनी चाहिए थी। यदि यह हो जाती तो ज्यादा अच्छा रहता। यह व्यवस्था नहीं की गई। यह मिसमैनेजमेंट था। मैंने उसी बारे में बात की थी। उन्होंने भी स्वीकार किया कि गलती हुई है। लेकिन एयरपोर्ट अथॉरिटी बार-बार हमें आश्वासन दे रही थी कि 10 मिनट में हो रहा है, पांच मिनट में हो रहा है। इसी तरह हमें लटकाकर चार घंटे निकाल दिए गए। उसके बाद अंदर ले जाया गया। अंदर ले जाने में भी हमें परेशानी हुई। इसके बाद फ्लाइट में बैठाया गया। फ्लाइट में बैठाने के बाद रनवे तक ले जाया गया। फिर फॉर्म से जुड़ी जानकारी आ गई। उसके बाद हम लोग रुक गए और फिर वापस आ गए। इस तरह की घटना को बेहतर तरीके से मैनेज किया जाना चाहिए था। मेरी नाराजगी व्यवस्थाओं को लेकर थी। व्यवस्थाएं नहीं हो पाईं, इसलिए मैंने यह बात कही थी।

 

 ‘भाजपा नाम बताए’, कांग्रेस विधायक का सीधा सवाल

इन सवालों के बाद जब कांग्रेस विधायक से पार्टी की हार पर सवाल किया तो उन्होंने कहा कि आपने देखा है कि पूरा घटनाक्रम किस तरह चल रहा था। उसमें लोग अपनी-अपनी लड़ाई लड़ रहे थे, लेकिन सामने वाली पार्टी देखिए किस तरह इसका गलत उपयोग कर रही थी। एक तरफ एयरपोर्ट पर हमें रोका जा रहा था और जाने नहीं दिया जा रहा था। दूसरी तरफ फॉर्म भी रिजेक्ट किए जा रहे थे। फॉर्म रिजेक्ट करने का कोई बड़ा कारण नहीं था। अगर कोई बड़ा कारण होता तो बात समझ में आती। लेकिन कारण था ही नहीं। एक नोटिस के आधार पर आपने रोक दिया। नोटिस का कोई महत्व नहीं होता। अगर कोर्ट उस नोटिस का संज्ञान लेकर एफआईआर दर्ज कराता या कोई आपराधिक मामला चलता, तब बात समझ में आती। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं था। इसके बावजूद केवल नोटिस के आधार पर फॉर्म रिजेक्ट कर दिया गया। यह दुर्भाग्यपूर्ण है और इसी बात को लेकर हम लोगों के बीच काफी चर्चा हुई थी। भाजपा ने कहा कि मीनाक्षी नटराजन के बारे में हमें तो कांग्रेस वालों ने ही बताया? मेरा भाजपा वालों से यह कहना है कि अगर आपको किसी ने बताया है तो नाम स्पष्ट करिए। आपको किसी ने बताया है, किसी नेता ने बताया है या किसी ने जानकारी दी है, तो आप साफ-साफ बताइए। आप नाम स्पष्ट क्यों नहीं कर रहे हैं? आप नाम इसलिए नहीं बता रहे हैं क्योंकि आप लोगों का ध्यान भटकाने की कोशिश कर रहे हैं। आपने फॉर्म गलत तरीके से रिजेक्ट किया है और अब उसे बचाने के लिए कांग्रेस के ऊपर ही आरोप मढ़ रहे हैं। इस तरह की बातें की जा रही हैं।

दोगने ने आगे कहा कि अगर किसी ने जानकारी दी है तो बताइए कि कौन नेता था? किसने जानकारी दी? आप स्पष्ट क्यों नहीं कर रहे हैं? केवल गोलमोल बातें कर रहे हैं। जनता भी देख रही है कि किस तरह भाजपा सरकार अन्याय कर रही है। जब आपके पास संख्या बल नहीं है, तब आप किस आधार पर चुनाव जीतने की बात कर रहे हैं? आपके पास 48 वोट थे, जबकि जीत के लिए 58 वोट चाहिए थे। ये 10 वोट कहां से लाते, यह तो बताइए। लेकिन इस पर कोई चर्चा नहीं हो रही है। कोई यह नहीं बता रहा कि 10 वोट कहां से आते। एक तरफ आप खरीद-फरोख्त की बात करते हैं और दूसरी तरफ फॉर्म रिजेक्ट करा देते हैं। जब आपको लगा कि कांग्रेस के सभी विधायक संगठित हैं, सभी एक साथ हैं, बैठक कर चुके हैं और परिवार सहित एक साथ जाने को तैयार हैं, तब आपको समझ में आ गया कि खरीद-फरोख्त नहीं हो पाएगी। कोई विधायक टूटने वाला नहीं है और हमारा उम्मीदवार हार जाएगा। यही घबराहट थी, जिसके कारण यह निर्णय लिया गया। इसलिए मैं कहता हूं कि यह पूरा राजनीतिक खेल खेला गया है। लोकतंत्र में ऐसे खेल नहीं होने चाहिए। लोकतंत्र में सम्मान होना चाहिए। कानून का सम्मान होना चाहिए और कानून के दायरे में रहकर काम होना चाहिए।

क्या कांग्रेस के भीतर ही था विरोध? 

नहीं, ऐसा बिल्कुल नहीं था। उन्हें सर्वसम्मति से उम्मीदवार बनाया गया था। हम लोगों की बैठक हुई थी और उसके बाद ही फॉर्म भरा गया था। पूरी प्रक्रिया सर्वसम्मति से हुई थी। उसमें किसी प्रकार की कोई दिक्कत नहीं थी। मेरी बात केवल व्यवस्थाओं को लेकर हुई थी। मैंने कहा था कि यदि आप व्यवस्था नहीं कर पा रहे हैं तो व्यवस्था पर ध्यान देना चाहिए। जब विधायकों को लेकर जा रहे हैं, तब उनकी सुरक्षा और अन्य सुविधाओं पर भी ध्यान देना चाहिए। मेरी नाराजगी इन्हीं व्यवस्थाओं को लेकर थी। इसके अलावा कोई दूसरी बात नहीं थी। अगर भाजपा को लगता है कि कांग्रेस का कोई नेता इसमें शामिल है, तो उसका नाम बताए। प्रमाण दे। हम पार्टी में शिकायत भी करेंगे और कार्रवाई भी कराएंगे।

लेकिन मेरा सवाल यह है कि आप पहले यह बताइए कि आपके पास 58 वोट नहीं थे। आपके पास संख्या बल नहीं था। फिर आपने उम्मीदवार किस आधार पर उतार दिया? 48 वोट के सहारे आपका उम्मीदवार कैसे जीत सकता था? इसका मतलब साफ है कि आपके मन में पहले से कोई दूसरी योजना थी। आपने उम्मीदवार भी उसी सोच के साथ उतारा था। आपको उम्मीद थी कि खरीद-फरोख्त कर लेंगे। लेकिन जब कांग्रेस के विधायक नहीं टूटे, तब आपने दूसरा रास्ता अपना लिया और फॉर्म रिजेक्ट करा दिया।

फॉर्म रिजेक्शन को लेकर विधायक ने उठाए गंभीर सवाल

फॉर्म में साफ लिखा होता है कि आपराधिक प्रकरणों की जानकारी देनी है। लेकिन यहां कोई आपराधिक प्रकरण था ही नहीं। यह एक निजी शिकायत (प्राइवेट कंप्लेंट) थी। उसका एक नोटिस था। वह भी थर्ड पार्टी नोटिस था। जिन लोगों के बीच विवाद था, वे अलग लोग थे। उन लोगों में से किसी ने यह आरोप लगाया था कि मीनाक्षी नटराजन कांग्रेस की प्रभारी हैं और किसी की मदद कर रही हैं। बस इतना ही आरोप था। इसके अलावा कुछ नहीं था। अब मेरा सवाल है कि क्या केवल इस तरह के आरोप के आधार पर किसी उम्मीदवार का फॉर्म रिजेक्ट किया जा सकता है? लोकतंत्र में थोड़ा बहुत ध्यान रखना चाहिए। जनता की आवाज को दबाया नहीं जाना चाहिए। जनता की आवाज संख्या बल से तय होती है। आपको 58 वोट चाहिए थे। अगर आपके पास 58 वोट होते तो आप जीतते। लेकिन जब आपके पास संख्या बल ही नहीं था, तब फिर उम्मीदवार क्यों उतारा गया? आपको आवेदन ही नहीं देना चाहिए था। फॉर्म ही नहीं भरना चाहिए था। जब संख्या नहीं थी तो फिर फॉर्म किस आधार पर भरा गया?

6 जून की बैठक में कैसे बना मीनाक्षी नटराजन के नाम पर सहमति?

यह फैसला पूरी सहमति से हुआ था। 6 तारीख को हम लोगों की बैठक हुई थी। उस बैठक में विस्तार से चर्चा हुई थी। सभी विधायक मौजूद थे और मीनाक्षी जी भी वहां थीं। सभी मुद्दों पर चर्चा हुई और उसके बाद सर्वसम्मति से फैसला लिया गया। ऐसा बिल्कुल नहीं था कि किसी उम्मीदवार को थोपा गया हो या किसी को आपत्ति रही हो। मीनाक्षी नटराजन सर्वमान्य उम्मीदवार थीं। सभी लोगों ने उनका समर्थन किया था। 8 तारीख को सभी विधायक एक साथ गए और उनका नामांकन दाखिल कराया। इसके बाद यह योजना बनी कि सभी लोग बाहर जाएंगे। 9 तारीख को बाहर जाने का कार्यक्रम तय हुआ था। लेकिन उसी दौरान यह पूरा घटनाक्रम हो गया। फॉर्म की जांच के दौरान उसे रिजेक्ट कर दिया गया। उसके बाद पूरा खेल बिगड़ गया। हमें लगता है कि यह सब पहले से योजनाबद्ध था। किसी भी तरह जीत हासिल करना उनका उद्देश्य था।

‘राष्ट्रपति से मिलने का समय मांगा लेकिन नहीं मिला’

उनका उद्देश्य साफ था कि किसी भी तरह चुनाव जीतना है। लेकिन लोकतंत्र में ऐसा नहीं होता। जब आपके पास वोटिंग पावर ही नहीं है, तब आप कैसे जीत सकते हैं? यह भी सोचना चाहिए। अगर लोकतंत्र को दादागिरी, दबाव और राजनीतिक ताकत के जरिए चलाया जाएगा तो फिर लोकतंत्र बचेगा कैसे? देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था तभी मजबूत रहेगी, जब संख्या बल और जनमत का सम्मान होगा। आज हम लोग दिल्ली में प्रदर्शन कर रहे थे। हम जंतर-मंतर तक मार्च करने जा रहे थे। राष्ट्रपति से मिलने का समय मांगा गया था, लेकिन समय नहीं मिला। इसके बाद जब हम बाहर निकले तो लोगों को आगे बढ़ने तक नहीं दिया गया। कई लोगों को वहीं से हिरासत में ले लिया गया। मैं पूछना चाहता हूं कि जब आपके पास सत्ता है, संख्या बल है और सारी ताकत आपके पास है, तब आपको डरने की क्या जरूरत है?

बाड़ेबंदी क्यों जरूरी समझी गई? कांग्रेस विधायक ने बताई पूरी वजह

देखिए, संभावना हमेशा बनी रहती है और उसी संभावना को देखते हुए सभी लोगों को एक साथ रखने की योजना बनाई गई थी। उद्देश्य यह था कि सभी विधायक एकता के साथ रहें, परिवार सहित रहें और फिर वापस आकर मतदान करें। कांग्रेस का उद्देश्य बिल्कुल स्पष्ट था कि हमारे उम्मीदवार को पूरे वोट मिलें। हम चाहते थे कि सभी विधायक एकजुट रहें और किसी तरह की कोई गलतफहमी या भ्रम की स्थिति पैदा न हो। इसके अलावा एक दूसरा पहलू भी था। विधायक अपने व्यस्त राजनीतिक जीवन में अक्सर एक-दूसरे से मिल नहीं पाते हैं। परिवार सहित साथ रहने का अवसर मिलता तो आपसी संवाद भी होता और सभी लोग एक साथ समय भी बिता लेते। सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि यदि विधायक यहां रहते तो उन पर तरह-तरह के दबाव और प्रलोभन डाले जा सकते थे। राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए यह आशंका बनी हुई थी कि गलत तरीके से दबाव बनाया जा सकता है। इन्हीं संभावनाओं से बचने के लिए सभी लोगों को एक साथ रखने का फैसला किया गया था। इसलिए बाड़ेबंदी का उद्देश्य किसी पर अविश्वास नहीं था, बल्कि सभी विधायकों को एकजुट बनाए रखना था।

दिग्विजय सिंह की चुप्पी पर क्या बोले विधायक?

प्रेस कॉन्फ्रेंस में हमने देखा कि जीतू पटवारी माइक पकड़ाते रह गए दिग्विजय सिंह साहब को मीनाक्षी नटराजन के मामले में, लेकिन उन्होंने बोलने से इनकार कर दिया? दिग्विजय सिंह जी 6 तारीख से लगातार हमारे साथ थे। वे सभी बैठकों में मौजूद थे और पूरे घटनाक्रम की जानकारी उन्हें थी। वे हर चर्चा और हर गतिविधि में शामिल रहे। इसलिए यह कहना गलत होगा कि वे किसी बात से अलग थे या किसी तरह की असहमति रखते थे। सोशल मीडिया और मीडिया में जो बातें दिखाई जा रही हैं, वे अलग बात हैं। लेकिन वास्तविकता यह है कि हमारी बैठकों में ऐसी कोई चर्चा नहीं हुई थी। न कोई मतभेद था, न कोई मनमुटाव था और न ही किसी प्रकार की कोई बहस हुई थी। हम लोग स्वयं बैठकों में मौजूद थे और हमने पूरी प्रक्रिया देखी है। आज भी सभी नेता एक साथ हैं। सभी ने मिलकर गिरफ्तारी दी और गिरफ्तारी देने के बाद भी सभी लोग साथ बैठे और भोजन किया। इसलिए जो बातें बाहर दिखाई जा रही हैं, उनका वास्तविक घटनाक्रम से कोई संबंध नहीं है।

 

पार्टी के नेता कहां गलती कर रहे हैं?  

बात हुई है। मुझसे पूछा भी गया था और मैंने अपनी बात स्पष्ट रूप से रखी थी। मैंने कहा था कि जब परिवार सहित लोगों को बुलाया गया था तो उनकी पूरी व्यवस्था होनी चाहिए थी। यदि आप परिवारों को बुला रहे हैं तो उनके बैठने, खाने-पीने और अन्य आवश्यक सुविधाओं की व्यवस्था पहले से होनी चाहिए। इस बात को स्वीकार भी किया गया। मुझसे कहा गया कि हां, यहां व्यवस्था के स्तर पर कमी रह गई थी और यह बेहतर तरीके से किया जाना चाहिए था। मैंने यह भी कहा कि डमी फॉर्म को लेकर भी गंभीरता दिखाई जानी चाहिए थी। इस विषय पर भी चर्चा हुई और माना गया कि डमी फॉर्म भरा जाना चाहिए था। हालांकि यह भी सच है कि पहले भी कई चुनावों में डमी फॉर्म नहीं भरे गए हैं। इसलिए किसी को यह अंदेशा नहीं था कि इस आधार पर इतनी बड़ी समस्या खड़ी हो सकती है। फिर भी यह एक ऐसी चूक थी, जिस पर आगे ध्यान दिया जाना चाहिए।

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डमी फॉर्म नहीं भरना बना बड़ी चूक?

डमी फॉर्म को लेकर चर्चा हुई। मेरा मानना है कि डमी फॉर्म भरा जाना चाहिए था। हालांकि पहले भी कई बार ऐसा हुआ है कि डमी फॉर्म नहीं भरे गए और कोई समस्या नहीं आई। इसलिए किसी को यह अंदेशा नहीं था कि इस बार इसी मुद्दे को आधार बनाकर पूरा मामला प्रभावित किया जा सकता है। संख्या बल हमारे पक्ष में था। सभी राजनीतिक परिस्थितियों को देखकर ही फॉर्म भरा गया था। इसलिए किसी को यह उम्मीद नहीं थी कि इस तरह की कार्रवाई होगी। लेकिन अब पीछे मुड़कर देखने पर लगता है कि डमी फॉर्म भरना एक अतिरिक्त सुरक्षा उपाय साबित हो सकता था।

भाजपा की मंशा पर उठाए सवाल

विधायक ने आरोप लगाया कि भाजपा के मन में पहले से ही कुछ और योजना थी। उनका कहना था कि यदि भाजपा ने उम्मीदवार उतारा था तो उसके पीछे दो ही संभावनाएं थीं। पहली, खरीद-फरोख्त के जरिए संख्या जुटाने की कोशिश। दूसरी, किसी तकनीकी आधार पर विरोधी उम्मीदवार का रास्ता रोकना। विधायक का आरोप है कि जब खरीद-फरोख्त की संभावना सफल होती नहीं दिखी, तब दूसरा रास्ता अपनाया गया और फॉर्म रिजेक्ट करा दिया गया। उन्होंने कहा कि यह लोकतंत्र की भावना के अनुरूप नहीं है और ऐसे तरीके लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचाते हैं।

चुनाव आयोग और लोकतांत्रिक संस्थाओं से भी की अपील

विधायक ने कहा कि लोकतंत्र में संविधान और संवैधानिक संस्थाओं का सम्मान सबसे ऊपर होना चाहिए। उन्होंने कहा कि जब जनता चुनावों के माध्यम से अपनी इच्छा व्यक्त करती है तो उस इच्छा का सम्मान होना चाहिए। राजनीतिक दलों को भी लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप आचरण करना चाहिए। उनका कहना था कि किसी भी चुनावी प्रक्रिया में ऐसे फैसलों से बचना चाहिए, जिनसे जनता का विश्वास कमजोर हो। उन्होंने चुनाव आयोग और अन्य संस्थाओं से भी अपील की कि वे ऐसे निर्णय लें, जिनसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया मजबूत हो और जनता का भरोसा बना रहे।

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‘संविधान का सम्मान करते हुए देश को आगे बढ़ाना होगा’

विधायक ने कहा कि मेरा केवल इतना कहना है कि लोकतंत्र में संविधान का सम्मान होना चाहिए। संविधान ने सभी को अधिकार दिए हैं और उन्हीं अधिकारों के आधार पर राजनीतिक प्रक्रिया चलती है। यदि संख्या बल किसी के पास नहीं है और उसके बावजूद परिणाम को प्रभावित करने की कोशिश की जाती है, तो यह लोकतंत्र की भावना के खिलाफ है। उन्होंने कहा कि जनता का विश्वास संस्थाओं पर बना रहना चाहिए। यदि लोगों का भरोसा टूटता है तो लोकतांत्रिक व्यवस्था कमजोर होती है।इसलिए सभी राजनीतिक दलों, संवैधानिक संस्थाओं और सरकारों को मिलकर संविधान का सम्मान करते हुए देश को आगे बढ़ाने का काम करना चाहिए। यही लोकतंत्र की असली ताकत है और यही देशहित में भी है।



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