ब्रिक्स देशों के एग्रीकल्चर वर्किंग ग्रुप की इंदौर में मंगलवार से शुरू हुई बैठक का इंदौर में आयोजन इंदौर के खेती के प्रति ऐतिहासिक महत्व को दर्शाता है। देश की आजादी के काफी पहले ही होलकर रियासत ने कृषि को विशेष महत्व दिया था। चूंकि, मालवा- निमाड़ में कपास की अच्छी खेती होती थी, इसलिए इंदौर में 1867 में स्टेट कॉटन मिल की स्थापना हुई थी। इसके बाद 1909 में मालवा मिल और बाद में धीरे-धीरे पांच और सूती कपड़ों की मिलें स्थापित हुईं। एक और उल्लेखनीय बात यह है कि आजादी के पहले ही 1924 में इंदौर में कृषि शिक्षण और अनुसंधान केंद्र शुरू हो गया था। यही संस्थान आगे चलकर 1959 में शासकीय कृषि महाविद्यालय बना।
इंस्टिट्यूट ऑफ प्लांट इंडस्ट्री स्थापित किया
इंदौर की कपड़ा मिलों में अच्छा कपास प्राप्त हो इसके लिए कपास के बीज और उसकी खेती पर विशेष ध्यान दिया गया था। खेती के तरीकों में सुधार और अधिक पैदावार के लिए किसानों को शिक्षित किया जाना जरूरी था। होलकर राज्य में लालबाग में गुलाब उद्यान और नगर ने कई बाग-बगीचों के लिए विशेष किस्में विदेशों से बुलवाई गई थींं। उनकी देखभाल के लिए उद्यान विशेषज्ञ डब्ल्यूएफ विस्को की नियुक्ति की गई थी। कृषि और उद्यानों के समुचित विकास और शिक्षा के लिए तत्कालीन मध्यभारत प्रांत के अधीन आने वाले इंदौर में प्रथम कृषि शिक्षा केंद्र इंस्टिट्यूट ऑफ प्लांट इंडस्ट्री की स्थापना की गई थी।

तुकोजीराव ने दी 300 एकड़ जमीन
वर्ष 1924 में इंदौर की होलकर रियासत के तत्कालीन महाराजा तुकोजीराव तृतीय ने 300 एकड़ भूमि कृषि शिक्षण और अनुसंधान कार्य के लिए उक्त संस्थान को दी थी। इसी भूमि पर इंस्टिट्यूट ऑफ प्लांट इंडस्ट्री का उदय हुआ। कैप्टन एल. सी. धारीवाल की इंदौर स्टेट गजेटियर 1931 के अनुसार संस्थान को 99 वर्ष की लीज पर उक्त भूमि प्रदान की गई। इसका किराया 300 रुपये प्रतिवर्ष निर्धारित किया गया था। यहां हॉवर्ड को निदेशक नियुक्त किया गया था।भारतीय केंद्रीय कॉटन कमेटी ने इस संस्था के भवन निर्माण के लिए तीन लाख रुपये और एक लाख रुपये अन्य व्यय के लिए राशि प्रदान की थी।
1959 में कृषि महाविद्यालय बना
1928 में यह संस्था रजिस्टर्ड की गई थी। इस संस्था में गेहूं और विशेषकर कपास की खेती के लिए उल्लेखनीय कार्य किया गया। उस समय यहां की प्रयोगशाला उन्नत अनुसंधान संस्थाओं में थी। इसी संस्था का विलय कर इसे 1959 में शासकीय कृषि महाविद्यालय का रूप दिया गया।
महात्मा गांधी ने बताई मल मूत्र से खाद की विधि
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जब अपनी दूसरी इंदौर यात्रा में अप्रैल 1935 में आए तो उन्होंने इंस्टिट्यूट ऑफ प्लांट इंडस्ट्री का दौरा किया था। तब इस संस्थान के निदेशक रहे एफके जैक्सन से वे काफी प्रभावित हुए थे। गांधी जी ने तब मल-मूत्र से खाद तैयार करने की संभावना व्यक्त की थी। इस दौरे के दौरान गांधी जी के साथ मीरा बेन और महादेव देसाई भी थे।
गिडीज रिपोर्ट में कृषि संग्रहालय का उल्लेख
1818 में विश्व के प्रसिद्ध नगर नियोजक सर पैट्रिक गिडीज ने अपनी रिपोर्ट के दूसरे भाग में कृषि संग्रहालय का जिक्र किया है। इस संग्रहालय में कृषि से जुडी सामग्री, अनाज, जुताई के तौर-तरीकों का उल्लेख किया गया। गिडीज ने अपनी रिपोर्ट के दूसरे भाग में लिखा था कि कृषि कार्य के प्राचीन तरीकों के बजाय नए उपकरणों का प्रयोग किया जाए। इसके लिए कृषि शिक्षा पर जोर दिया था। पैट्रिक गिडीज की रिपोर्ट में मध्य भारत के कृषि सलाहकार बी. कोवेंट्री. एस्कर की सलाह का उल्लेख किया है।
कृषि क्षेत्र में सक्रिय इंदौर के संस्थान
इंदौर में शासकीय कृषि महाविद्यालय आज भी हजारों छात्रों को शिक्षा दे रहा है। यहां कृषि अनुसंधान का कार्य भी लगातार हो रहा है। इसी तरह जैविक ग्राम संस्थान रंगवासा में वर्ष 2007 से आरंभ हुआ। यहां पर प्राकृतिक खेती की तकनीक सिखाई जा रही है। यहां देश विदेश के लोग जैविक खेती सीखने आते हैं। ग्राम सनावदिया में डॉ. जनक पलटा मगिलिगन जिम्मी मगिलिगन फाउंडेशन फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट में जैविक खेती पर उल्लेखनीय कार्य कर रही हैं।
ब्रिक्स में कौन कौन से देश
ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका इन पांच देशों ने वर्ष 2006 ब्रिक्स संगठन का गठन किया था। वर्ष 2024-25 में इस संगठन का विस्तार किया गया और इसमें मिस्र, इथिओपिया, ईरान, इंडोनेशिया, संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब को शामिल किया गया। इस तरह कुल देश की संख्या 11 हो गई। इस संगठन का उद्देश्य सदस्य देशों के बीच आर्थिक, वित्तीय, सहयोग और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी बात रखना है। इंदौर में आयोजित ब्रिक्स देशों के कृषि मंत्रियों के सम्मेलन में खाद्य सुरक्षा, जलवायु कृषि और किसानों के सशक्तिकरण जैसे मुद्दों पर विचार होगा।
