मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका के दुरुपयोग के मामले में दतिया निवासी याचिकाकर्ता पर 50 हजार रुपये का जुर्माना ल …और पढ़ें

Publish Date: Tue, 19 May 2026 07:24:09 PM (IST)Updated Date: Tue, 19 May 2026 07:27:14 PM (IST)

पुलिस पर झूठे आरोप लगाने पर हाई कोर्ट सख्त, याचिकाकर्ता पर 50 हजार का जुर्माना, बहन को अवैध हिरासत में रखने का आरोप निकला झूठा

HighLights

  1. झूठे आरोप लगाना न्याय व्यवस्था के साथ खिलवाड़ है
  2. दतिया निवासी याचिकाकर्ता पर 50 हजार का जुर्माना लगाया
  3. बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर कर आरोप लगाया था

नईदुनिया प्रतिनिधि, ग्वालियर। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका के दुरुपयोग के मामले में दतिया निवासी शैलेंद्र सिंह पर 50 हजार रुपये का जुर्माना लगाया है। कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि कानून का दुरुपयोग कर पुलिस पर झूठे आरोप लगाना न्याय व्यवस्था के साथ खिलवाड़ है।

यदि इस प्रकार की प्रवृत्ति बढ़ी तो पुलिस अपना कर्तव्य प्रभावी ढंग से नहीं निभा पाएगी। मामले की सुनवाई जस्टिस जीएस अहलुवालिया और जस्टिस पुष्पेंद्र यादव की खंडपीठ ने की।

बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर कर आरोप लगाया था

याचिकाकर्ता शैलेंद्र सिंह ने अदालत में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर कर आरोप लगाया था कि महाराजपुरा थाना पुलिस ने उसकी बहन, उसके दो वर्षीय बेटे और तीन अन्य परिजनों को अवैध रूप से हिरासत में रखा है। इस पर कोर्ट ने पुलिस से जवाब तलब किया था।

सुनवाई के दौरान सरकारी पक्ष ने केस डायरी पेश करते हुए अदालत को बताया कि संबंधित महिला पुलिस हिरासत में नहीं, बल्कि अपने घर पर सुरक्षित है। इसके बाद याचिकाकर्ता पक्ष महिला को कोर्ट में पेश करने के लिए तैयार हुआ।

महिला ने कहा, 11 मई को पुलिस दोबारा उठाकर ले गई

महिला ने अदालत को बताया कि उसका पति हत्या के एक मामले में फरार है। उसने आरोप लगाया कि 10 मई को पुलिस ने उसे किसी अज्ञात स्थान पर बंधक बनाकर रखा और छोड़ने के लिए एक लाख रुपये की मांग की। महिला ने यह भी कहा कि 11 मई को पुलिस दोबारा उसे उठाकर ले गई और उसके रिश्तेदार श्यामू गुर्जर के साथ मारपीट की गई।

सुनवाई के दौरान कोई वीडियो साक्ष्य पेश नहीं किया गया

खंडपीठ ने जब महिला से पूछताछ की तो वह उस स्थान का नाम नहीं बता सकी, जहां कथित तौर पर उसे रखा गया था। अदालत ने यह भी पाया कि एक लाख रुपये मांगने का आरोप मूल याचिका में दर्ज ही नहीं था। याचिका में दावा किया गया था कि पुलिस द्वारा जबरन ले जाने की पूरी घटना सीसीटीवी कैमरे में रिकॉर्ड है, लेकिन सुनवाई के दौरान ऐसा कोई वीडियो साक्ष्य पेश नहीं किया गया।



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