महिला की ओर से अदालत को बताया गया कि उसने संबंधित अधिकारियों के समक्ष कई बार आवेदन प्रस्तुत किए और 25 जून 2019 को आवश्यक दस्तावेजों के साथ प्रतिनिधित् …और पढ़ें

HighLights
- सुनवाई में सरकारी दलीलें दरकिनार।
- 30 हजार रुपये का मुआवजा निर्धारित है।
- बच्चे की जिम्मेदारी पर फैसला
नईदुनिया प्रतिनिधि, ग्वालियर। मध्यप्रदेश हाई कोर्ट ने नसबंदी ऑपरेशन विफल होने के मामले में भिंड जिले की एक महिला को मुआवजा देने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने कहा कि परिवार नियोजन क्षतिपूर्ति योजना 2013 के तहत महिला मुआवजे की हकदार है और केवल देरी के आधार पर उसका दावा खारिज नहीं किया जा सकता। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति मिलिंद रमेश फड़के की एकलपीठ ने की।
महिला ने 2013 में कराया था नसंबदी आपरेशन
याचिकाकर्ता महिला की ओर से अधिवक्ता ने पक्ष रखते हुए कहा कि महिला ने 29 नवंबर 2013 को सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र गोहद में नसबंदी आपरेशन कराया था। इसके बावजूद बाद में वह गर्भवती हो गई और चार अगस्त 2015 को उसने एक पुत्र को जन्म दिया।
याचिकाकर्ता ने इसे नसबंदी प्रक्रिया की विफलता बताते हुए परिवार नियोजन क्षतिपूर्ति योजना 2013 के तहत मुआवजे की मांग की थी। महिला की ओर से अदालत को बताया गया कि उसने संबंधित अधिकारियों के समक्ष कई बार आवेदन प्रस्तुत किए और 25 जून 2019 को आवश्यक दस्तावेजों के साथ प्रतिनिधित्व भी दिया, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की गई।
मुआवजा व बच्चे के पालन-पोषण की जिम्मेदारी की मांग
याचिका में दो लाख रुपये मुआवजा देने तथा बच्चे के पालन-पोषण की जिम्मेदारी राज्य शासन को सौंपने की मांग भी की गई थी। सुनवाई के दौरान राज्य शासन की ओर से तर्क दिया गया कि केवल नसबंदी विफल होने से अधिक मुआवजा देने का अधिकार स्वतः नहीं बनता और महिला ने काफी देरी से दावा प्रस्तुत किया है।
हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि इस मुद्दे पर पूर्व में खंडपीठ द्वारा दिए गए निर्णय में स्पष्ट किया जा चुका है कि परिवार नियोजन क्षतिपूर्ति योजना एक लाभकारी योजना है और केवल देरी के आधार पर पात्र व्यक्ति को मुआवजे से वंचित नहीं किया जा सकता।
अदालत ने माना कि रिकार्ड से यह स्पष्ट है कि महिला ने नसबंदी आपरेशन कराया था और उसके बाद बच्चे को जन्म दिया, जिससे नसबंदी विफल होने का तथ्य स्थापित होता है। कोर्ट ने कहा कि योजना के तहत ऐसे मामलों में 30 हजार रुपये का मुआवजा निर्धारित है।
हालांकि अदालत ने दो लाख रुपये अतिरिक्त मुआवजा और बच्चे के पालन-पोषण की जिम्मेदारी राज्य शासन पर डालने की मांग को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि रिट क्षेत्राधिकार में योजना से अधिक राहत नहीं दी जा सकती। हाई कोर्ट ने राज्य शासन को निर्देश दिया कि महिला को 30 हजार रुपये का मुआवजा छह प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित दिया जाए। यह ब्याज 25 जून 2019 को दिए गए आवेदन की तारीख से वास्तविक भुगतान तक देय होगा।
