नईदुनिया प्रतिनिधि, ग्वालियर: चावड़ी बाजार लश्कर स्थित बहुचर्चित रामजानकी मंदिर और उससे जुड़े भवन को लेकर लंबे समय से चल रहे विवाद में न्यायालय ने महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है। नवम जिला न्यायाधीश आत्माराम टांक की अदालत ने स्पष्ट किया कि यह संपत्ति निजी नहीं बल्कि शासकीय है। इस निर्णय के साथ ही वर्षों से जारी विवाद पर विराम लग गया है।

अदालत ने वादी कैलाश नारायण दीक्षित द्वारा प्रस्तुत स्वामित्व और आधिपत्य के दावे को साक्ष्यों के अभाव में निरस्त कर दिया।

वादी का दावा: पुश्तैनी संपत्ति और निजी मंदिर

वादी कैलाश नारायण दीक्षित ने न्यायालय में दावा किया था कि चावड़ी बाजार स्थित म्युनिसिपल भवन उनके पूर्वजों की पुश्तैनी संपत्ति है। उनके अनुसार, उनके दादा बाबूलाल दीक्षित, परदादा शीतल प्रसाद दीक्षित और उनसे पहले नारायण दास दीक्षित इस संपत्ति के मालिक के रूप में रहते आए थे।

वादी ने यह भी कहा कि भवन के एक हिस्से में स्थित श्रीरामजानकी मंदिर उनका निजी मंदिर है, जिस पर उनका वर्षों से स्वामित्व और नियंत्रण रहा है। अपने दावे को मजबूत करने के लिए उन्होंने संपत्ति कर रजिस्टर, मूल्यांकन प्रमाण-पत्र, निर्वाचन नामावली सहित कई दस्तावेज प्रस्तुत किए।

प्रतिवादी पक्ष के तर्क: शासकीय संपत्ति और समाज द्वारा प्रबंधन

वहीं, प्रतिवादी पक्ष में मध्यप्रदेश शासन, कलेक्टर ग्वालियर, औकाफ विभाग और चौरसिया समाज विकास संघ ने दावा किया कि यह संपत्ति शासकीय मंदिर है। उन्होंने बताया कि यह मंदिर औकाफ विभाग में दर्ज है और पूर्व में ग्वालियर रियासत द्वारा चौरसिया समाज को इसकी देखरेख सौंपी गई थी।

प्रतिवादी साक्षियों रामकुमार चौरसिया, श्रीलाल चौरसिया और भगवानदास चौरसिया ने बताया कि मंदिर का संचालन वर्षों से चौरसिया समाज द्वारा किया जाता रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि बाबूलाल दीक्षित को केवल पुजारी के रूप में नियुक्त किया गया था और उन्हें नेमनुख (वेतन) दिया जाता था।

इस दावे के समर्थन में वर्ष 1969 और 1971 की वेतन रसीदें प्रस्तुत की गईं, जिन पर बाबूलाल दीक्षित के हस्ताक्षर पाए गए।

राजस्व रिकॉर्ड और दस्तावेजों से खुलासा

प्रकरण में तहसीलदार महेश सिंह कुशवाह ने न्यायालय को जानकारी दी कि विवादित मंदिर राजस्व अभिलेखों में शासकीय भूमि के रूप में दर्ज है।

मिसिल बंदोबस्त संवत 1997 और वर्तमान खसरा वर्ष 2025-26 में भी यह संपत्ति “मंदिर श्रीरामजानकी, प्रबंधक कलेक्टर जिला ग्वालियर” के नाम से दर्ज है। इसके अलावा, औकाफ विभाग के सेंसस रजिस्टर में भी यह मंदिर शासकीय सूची में शामिल पाया गया।

न्यायालय की टिप्पणी: पुजारी होना स्वामित्व का प्रमाण नहीं

न्यायालय ने दोनों पक्षों के साक्ष्यों और दस्तावेजों का विस्तृत परीक्षण किया। इसमें पाया गया कि वर्ष 1960-61 से 1975-76 तक नगर निगम के संपत्ति कर रजिस्टर में संपत्ति “मंदिर श्रीरामजी” के नाम दर्ज थी।

हालांकि, वर्ष 1976-77 में अचानक बाबूलाल दीक्षित का नाम दर्ज हो गया, जिसके संबंध में कोई वैध आदेश या प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया गया। न्यायालय ने इसे संदिग्ध माना और कहा कि केवल ऐसे रिकॉर्ड के आधार पर स्वामित्व सिद्ध नहीं किया जा सकता।

अदालत ने यह भी कहा कि औकाफ विभाग के रिकॉर्ड में “निजी” शब्द की प्रविष्टि में छेड़छाड़ के संकेत हैं, जो विश्वसनीय नहीं हैं।

अंतिम निर्णय: वादी का दावा खारिज

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 101 के अनुसार अपने दावे को सिद्ध करने की जिम्मेदारी वादी पर होती है, जिसे वह पूरा करने में असफल रहा। इसी आधार पर अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि विवादित संपत्ति शासकीय है और वादी का उस पर कोई वैध स्वामित्व या आधिपत्य सिद्ध नहीं होता।



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