नईदुनिया प्रतिनिधि, ग्वालियर। 1857 की क्रांति की महानायिका वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई की समाधि पर दो दिवसीय ‘बलिदान मेला’ का बुधवार से भव्य शुभारंभ हो गया। मेले के पहले दिन रानी की कर्मस्थली झांसी दुर्ग से परंपरागत रूप से लाई गई पवित्र ‘बलिदान ज्योति’ को ग्वालियर के समाधि स्थल पर ससम्मान स्थापित किया गया। इस दौरान झमाझम बारिश के बीच राष्ट्रभक्तों का उत्साह देखने लायक था। मेले के दूसरे दिन यानी आज (18 जून) को समाधि स्थल के सामने मैदान में मध्य प्रदेश के उप मुख्यमंत्री जगदीश देवड़ा के मुख्य आतिथ्य में महानाट्य और अखिल भारतीय कवि सम्मेलन सहित कई बड़े आयोजन होने जा रहे हैं।

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भव्य झांकियां भी निकाली गईं। नईदुनिया

झांसी दुर्ग से आई ‘शहीद ज्योति’ का भव्य स्वागत

बुधवार शाम को झांसी के किले से प्रज्वलित होकर आई शहीद ज्योति यात्रा जैसे ही ग्वालियर के पड़ाव चौराहे पर पहुंची, वहां मौजूद जनसमुदाय ने उसका भव्य स्वागत किया। घुड़सवारों और देशभक्ति से ओत-प्रोत भव्य झांकियों के साथ इस पावन ज्योति को रानी लक्ष्मीबाई के समाधि स्थल तक लाया गया।

इस अवसर पर राज्य वित्त आयोग के अध्यक्ष व बलिदान मेला के संस्थापक अध्यक्ष जयभान सिंह पवैया सहित कई जनप्रतिनिधियों ने ज्योति की अगवानी की। पवैया ने कहा कि, “यह शहीद ज्योति रानी लक्ष्मीबाई की 1857 की क्रांति और उनके सर्वोच्च बलिदान की याद दिलाती है, जो आने वाली पीढ़ियों को हमेशा प्रेरित करती रहेगी।”

झांसी से आई ज्योति यात्रा

झांसी से विक्रम बुंदेला के नेतृत्व में बुंदेली युवा शहीद ज्योति यात्रा को ग्वालियर लेकर आए। इस आयोजन में पूर्व सांसद विवेक नारायण शेजवलकर, नगर निगम सभापति मनोज तोमर, मेला अध्यक्ष अशोक जादौन, जीडीए के अध्यक्ष मधुसूदन सिंह भदौरिया, भाजपा जिला अध्यक्ष जयप्रकाश राजौरिया, पूर्व विधायक घनश्याम पिरौनिया, राकेश माहौर, पप्पू वर्मा, कमल माखीजानी सहित अन्य जनप्रतिनिधिगण शामिल हुए। इसके बार प्रदर्शनी का उद्घाटन किया। किया।

प्रदर्शनी में रानी लक्ष्मीबाई के अस्त्र-शस्त्र देखने पहुंचे शहरवासी

बलिदान मेला में लगाए गए अस्त्र शस्त्र की प्रदर्शनी में लक्ष्मीबाई और तात्या टोपे के अस्त्र शस्त्रों को शामिल किया गया। इसमें लक्ष्मीबाई का जिरह बख्तर, चेस्ट प्लेट, पंजा, दस्ताना, गुर्ज, ढाल, खाण्डा, ऊना, कटार, गुप्ती, पटे प्रदर्शित किए गए। इनमें सबसे खास गुप्ती है, जो देखने में छड़ी लगती है, जबकि इसका इस्तेमाल महारानी रिवाल्वर और गुप्ती के रूप में भी करती थीं। बुधवार को इन शस्त्रों को देखने काफी संख्या में लोग पहुंचे।

प्रदेश के उप मुख्यमंत्री जगदीश देवड़ा होंगे मुख्य अतिथि

बलिदान मेला का प्रमुख समारोह 18 जून को प्रदेश के उप मुख्यमंत्री जगदीश देवड़ा के मुख्य आतिथ्य में लक्ष्मीबाई समाधि के सामने स्थित मैदान में शाम सात बजे आयोजित होगा। इस आयोजन में “खूब लड़ी मर्दानी” महानाट्य का मंचन, “क्रांतिवीर वंशज सम्मान” समारोह आयोजित होगा। अंत में अखिल भारतीय कवि सम्मेलन का आयोजन होगा। सम्मेलन में ओज की ख्यातिनाम कवियत्री कविता तिवारी, वीर रस के वरिष्ठ कवि जगदीश सोलंकी, हास्य कवि प्रताप फौजदार, प्रवीण शुक्ल, शंभू शिखर, श्रृंगार के कवि गजेन्द्र प्रियांशु, डा. कमलेश शर्मा, अभय सिंह निर्भीक व अखिलेश द्विवेदी काव्य पाठ करेंगे।

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प्रताप की प्रतिज्ञा नाटक का दृश्य।

हल्दी घाटी में महाराणा प्रताप का युद्ध कौशल देख छूट जाते हैं दुश्मन के छक्के

महाराणा प्रताप की जयंती के अवसर पर बलिदान मिले के मुख्य मंच पर नाटक ‘प्रताप की प्रतिज्ञा’ का मंचन किया गया। इस नाटक में प्रताप के बचपन से लेकर उनके युवावस्था एवं उनके युद्ध अभियानों की कहानी को प्रस्तुति किया गया। नाटक में दिखाया गया कि महाराणा प्रताप जब 17 वर्ष के थे, तब उन्होंने अपने युद्ध कौशल से कई क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया था।

महाराजा उदय सिंह के निधन पर चिता के समक्ष महाराणा प्रताप प्रतिज्ञा लेते हैं कि जब तक इन मुगलों को पराजित कर चित्तौड़ के दुर्ग पर फिर से केसरिया ध्वज नहीं फहरा देता, तब तक राज सुख का भोग नहीं करूंगा। राज सैया का इस्तेमाल नहीं करूंगा और न सोने-चांदी की थाली में भोजन करूंगा। पेड़ों की छांव पर मेरा महल होगा, पत्तल मेरे पात्र होंगे और घास की सैया मेरा बिछौना होगी। मेरे भाग्य में राजमहल का वैभव उसी दिन के लिए लिखा है, जब मैं इन मुगलों की गुलामी से मेवाड़ को मुक्त कराकर सिसोदिया वंश की केसरिया पताका फहरा दूंगा।

नाटक आगे बढ़ता है महाराणा प्रताप का राज्याभिषेक किया जाता है। इस दृश्य के बाद अकबर द्वारा मानसिंह को संधि प्रस्ताव भेजा जाता है, परंतु महाराणा संधि की जगह स्वाभिमान को चुनते हैं और संधि प्रस्ताव को अस्वीकार कर देते हैं और अकबर से सीधे युद्ध की बात करते हैं। इसके साथ ही 18 जून 1576 को हल्दीघाटी के मैदान में युद्ध होता है। महाराणा प्रताप के युद्ध कौशल से अकबर के सेनापति मानसिंह घबरा जाते हैं और उनकी सेना में अफरा तफरी मच जाती है और मुगलों को पीछे हटाना पड़ता है

महिलाओं को ससम्मान छुड़वाया दुश्मन के शिविर तक

आगे दिखाया जाता है कि अकबर, महाराणा प्रताप को बंदी बनाने के लिए वर्ष 1580 में सेनापति अब्दुल रहीम खान के नेतृत्व में बड़ी सेना भेजता है, जिसने शेरपुर में अपना शिविर लगाया होता है। उधर महाराणा प्रताप पराक्रमिक कुंवर अमर सिंह मुगलों को सबक सिखाने के लिए तैयार थे। अमर सिंह ने खान को बुरी तरह हराया और उसके परिवार को गिरफ्तार कर महाराणा प्रताप के दरबार में पेश किया, परंतु महाराणा प्रताप महिला सम्मान के प्रति बड़े सजग थे। उन्होंने अमर सिंह को तुरंत उन महिलाओं को अपने पूरे सैनिक सम्मान के साथ वापस खान के शिविर तक छोड़कर आने के लिए कहा।

ग्वालियर में सन् 1858 में हुई थी रानी लक्ष्मीबाई की शहादत

महारानी लक्ष्मीबाई की शहादत ग्वालियर में 18 जून 1857 को हुई थी। रानी लक्ष्मीबाई ने ग्वालियर किले पर अंग्रेजों से जमकर संघर्ष किया। दोनों हाथों में तलवार लेकर रानी ने अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध लड़ा। किले से रानी अपने घोड़े सहित स्वर्ण रेखा नदी तक लड़ते हुए आई और घायल अवस्था में रानी गंगादास की बड़ी शाला में पहुंचीं, जहां रानी ने संतों से अपनी देह अंग्रेजों के हाथ नहीं लगने देने की इच्छा जताई। साधुओं ने अंग्रेजों से लड़ाई लड़ी। 745 संत शहीद हो गए, लेकिन रानी लक्ष्मीबाई की देह का अंतिम संस्कार संतों ने ही किया। इसी जगह पर वीरांगना की समाधि है।



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