नईदुनिया प्रतिनिधि, ग्वालियर। भारत की आजादी की कहानी केवल तलवारों की चमक और रणभूमि के शौर्य तक सीमित नहीं थीं। इस महान गाथा में ऐसे अनेक नायक भी शामिल हैं, जिन्होंने बिना हथियार उठाए अपने साहस, त्याग और दूरदृष्टि से स्वतंत्रता संग्राम को नई दिशा दी। ऐसे ही एक अनमोल रत्न थे अमरचंद बांठिया, जिनका नाम इतिहास के स्वर्णिम पन्नों में दर्ज है।

बांठिया मूलत: राजस्थान के निवासी थे। प्रथम स्वाधीनता संग्राम में वे सिंधिया स्टेट की गंगाजलि ट्रस्ट के खजांची थे। वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई जब अंग्रेजों से संघर्ष करते ग्वालियर पहुंची, उस समय उनका खजाना खाली हो चुका था। सैनिकों के लिए भोजन तक की व्यवस्था नहीं थी, उस समय बांठिया ने रानी लक्ष्मीबाई के लिए सिंधिया स्टेट के खजाने के द्वार खोल दिए थे। इस राष्ट्रसेवा को अंग्रेजों ने राजद्रोह मानते हुए उन्हें सराफा बाजार में नीम के पेड़ पर फांसी पर लटका दिया था। उसी नीम के आज भी अमर बलिदानी का स्मारक है।

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बीकानेर में जन्में थे बांठिया

वर्ष 1793 में राजस्थान के बीकानेर में जन्मे अमरचंद बांठिया एक साधारण व्यापारी परिवार से थे। उनका परिवार अपनी ईमानदारी, परिश्रम और सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए जाना जाता था। आर्थिक कठिनाइयों के कारण उनके पिता को परिवार सहित ग्वालियर आना पड़ा। ग्वालियर के तत्कालीन शासकों के संरक्षण में परिवार ने अपना व्यापार फिर से शुरू किया और धीरे-धीरे सफलता की नई ऊंचाइयों तक पहुंचा। अमरचंद बचपन से ही गंभीर, संवेदनशील और देशभक्त विचारों वाले थे। वे अक्सर वीरों की गाथाएं सुनते और देश के लिए कुछ करने का संकल्प लेते। हालांकि उस समय देशभक्ति की भावना मन में रखना भी आसान नहीं था। अंग्रेजी हुकूमत का दमन बढ़ता जा रहा था और हर विरोधी आवाज को कठोरता से दबाया जा रहा था।

गंगाजली ट्रस्ट खजाने का खजांची नियुक्त कर दिया: अपनी कुशलता, सादगी और ईमानदारी के कारण अमरचंद बांठिया जल्द ही ग्वालियर राजदरबार के विश्वासपात्र बन गए। महाराज जयाजीराव सिंधिया ने उन्हें ग्वालियर राज्य के प्रसिद्ध गंगाजली ट्रस्ट खजाने का खजांची नियुक्त किया। यह कोई साधारण जिम्मेदारी नहीं थी। गंगाजली ट्रस्ट खजाना अपनी अपार संपदा और गोपनीयता के लिए पूरे देश में प्रसिद्ध था। इसकी जानकारी केवल कुछ चुनिंदा लोगों तक ही सीमित रहती थी।

वीरांगना को सौंप दिया खजाना : वह समय जल्द ही आ गया। अंग्रेजों से संघर्ष करते हुए रानी लक्ष्मीबाई और तात्या टोपे ग्वालियर पहुंचे। लगातार युद्ध के कारण क्रांतिकारियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती संसाधनों और धन की कमी थी। सेना को भोजन, हथियार और अन्य आवश्यक सामग्री उपलब्ध कराना कठिन होता जा रहा था। ऐसे कठिन समय में अमरचंद बांठिया ने वह निर्णय लिया, जिसने उन्हें इतिहास में अमर कर दिया। उन्होंने ग्वालियर के गंगाजली राजकोष को क्रांतिकारियों के लिए खोल दिया और पूरा खजाना रानी लक्ष्मीबाई को सौंप दिया। यह केवल धन का दान नहीं था, बल्कि अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ खुला विद्रोह था। अमरचंद बांठिया जानते थे कि इस निर्णय का परिणाम क्या होगा। वे यह भी जानते थे कि अंग्रेज उन्हें कभी माफ नहीं करेंगे। इसके बावजूद उन्होंने अपने कर्तव्य और देशभक्ति को अपने जीवन से ऊपर रखा।

रानी के बलिदान के चार दिन बाद बांठिया को फांसी पर लटका दिया

अंग्रेजी हुकूमत अमरचंद बांठिया के इस साहसिक कदम से बौखला उठी। रानी लक्ष्मीबाई के बलिदान के चार दिन बाद 22 जून 1858 को अंग्रेजों ने उन्हें राजद्रोह का दोषी ठहराया और ग्वालियर के सर्राफा बाजार में एक नीम के पेड़ पर फांसी दे दी। बताया जाता है कि अंग्रेजों ने लोगों में भय पैदा करने के लिए उनकी पार्थिव देह को तीन दिनों तक पेड़ पर लटकाए रखा, ताकि कोई भी अंग्रेजी शासन के खिलाफ आवाज उठाने का साहस न कर सके। लेकिन अंग्रेज यह नहीं समझ पाए कि बलिदान कभी डर पैदा नहीं करता, बल्कि नई पीढ़ियों को प्रेरणा देता है।

ग्वालियर के सर्राफा बाजार में स्थित अमरचंद बांठिया का स्मारक हमें याद दिलाता है कि स्वतंत्रता केवल रणभूमि में लड़ी गई लड़ाइयों से नहीं मिली, बल्कि उन अनगिनत देशभक्तों के त्याग और समर्पण से मिली, जिन्होंने अपने प्राणों, संपत्ति और सुख-सुविधाओं का बलिदान कर दिया। अमरचंद बांठिया का जीवन हमें सिखाता है कि देशसेवा के लिए केवल हथियार उठाना ही आवश्यक नहीं होता। सच्ची देशभक्ति साहस, निष्ठा और सही समय पर सही निर्णय लेने में निहित होती है। आज आवश्यकता है कि हम ऐसे गुमनाम नायकों के योगदान को याद करें और उनकी प्रेरणा से राष्ट्र निर्माण में अपना योगदान दें। अमरचंद बांठिया का बलिदान सदैव हमें यह संदेश देता रहेगा कि मातृभूमि से बड़ा कोई धर्म और कर्तव्य नहीं होता।



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