घरवालों ने समझाया भी कि अब खुद को संभाल लो, लेकिन एक मां आखिर उम्मीद छोड़ भी कैसे दे? इसी मां के दर्द ने अब मध्य प्रदेश हाईकोर्ट तक एक बड़ा सवाल पहुंच …और पढ़ें

नईदुनिया प्रतिनिधि, ग्वालियर। उस मां की सुबह आज भी अपनी बेटी के नाम से शुरू होती है। वह उठते ही सबसे पहले दरवाजे की कुंडी देखती है। कभी-कभी रात में भी अचानक उठकर बाहर झांकती है। उसे लगता है शायद बेटी लौट आई हो और दरवाजा खटखटा रही हो। बेटी के गायब होने के बाद उसने घर में कुछ नहीं बदला। बच्ची की किताबें आज भी उसी जगह रखी हैं। दीवार पर उसकी मुस्कुराती एक तस्वीर टंगी है, मां कई बार उसे निकालकर सीने से लगा कर रोती है। घरवालों ने समझाया भी कि अब खुद को संभाल लो, लेकिन एक मां आखिर उम्मीद छोड़ भी कैसे दे? इसी मां के दर्द ने अब मध्य प्रदेश हाईकोर्ट तक एक बड़ा सवाल पहुंचा दिया है – आखिर गुम हुई बच्चियों का सच कहां खो जाता है?
एक केस ने खोला सैकड़ों बच्चियों के गायब होने का राज
एक ऐसा मामला जिसमें उठे एक सवाल ने हाईकोर्ट को भी आश्चर्यचकित कर दिया। एक बच्ची के खोने से शुरू हुई कहानी सैकड़ों बच्चियों के गायब होने का राज खोल गई। जब इसमें पुलिस से सवाल किए तो सभी की भूमिका पर सवाल खड़े हुए। चेहरे पर चिंता का भाव लेकर अधिवक्ता आशीष प्रताप सिंह ने अपना एक यादगार मुकदमा साझा किया। “मम्मी, मैं अभी आती हूं…” और फिर कभी नहीं लौटी… अधिवक्ता आशीष बताते हैं कि यह कहानी वर्ष 2022 की है। एक छोटी बच्ची अचानक गायब हो गई। घरवालों ने पहले रिश्तेदारों के यहां तलाशा, फिर मोहल्ले में खोजबीन हुई। देर रात पुलिस थाने पहुंचे और गुमशुदगी दर्ज हुई। मां को भरोसा था कि पुलिस कुछ घंटों में बेटी को खोज लाएगी, लेकिन दिन बीतते गए।
हर सुबह निराशा और हाईकोर्ट की चौखट
हर बार वही जवाब मिला – “तलाश जारी है।” मां हर सुबह बच्ची की फोटो लेकर निकलती – कभी बस स्टैंड, कभी रेलवे स्टेशन, कभी मंदिरों के बाहर। किसी बच्ची की शक्ल मिलती तो दौड़ पड़ती, लेकिन हर बार निराशा हाथ लगती। जब महीनों बाद भी बच्ची का कोई सुराग नहीं मिला तो वह मां मध्य प्रदेश हाईकोर्ट पहुंची। बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की गई। सुनवाई के दौरान पुलिस ने अदालत को बताया कि बच्ची को खोजने के लिए हर संभव प्रयास किए गए। दूसरे राज्यों तक तलाश की गई, पोस्टर लगाए गए और रिश्तेदारों से पूछताछ हुई, लेकिन बच्ची नहीं मिली। कोर्ट ने अंत में यह कहते हुए याचिका निपटा दी कि बच्ची मिलते ही उसे मां को सौंप दिया जाए। लेकिन अदालत की फाइल बंद होने से मां की जिंदगी सामान्य नहीं हुई।
पुलिसिया टालमटोल और वकील का संघर्ष
समय बीतता गया और बच्ची का कोई पता नहीं चला। एक दिन मां फिर पुलिस अधिकारियों के पास पहुंची। उसे उम्मीद थी कि शायद कोई नई जानकारी मिलेगी, लेकिन आरोप है कि वहां उसे सही जवाब देने के बजाय टाल दिया गया। वह घंटों बैठी रही, कई बार अधिकारियों के कमरे के बाहर गई, लेकिन कोई ठोस जवाब नहीं मिला। थककर वह सीधे अधिवक्ता आशीष प्रताप सिंह के पास पहुंची। रोते हुए उसने सिर्फ इतना कहा – “वकील साहब… जैसे मेरी बेटी गायब हुई है… वैसे न जाने कितनी मांओं की बेटियां गायब होती होंगी…” यही एक वाक्य इस पूरे मामले की सबसे बड़ी लड़ाई बन गया।
RTI और 6000 पन्नों का बहाना: सामने आया 800 बच्चियों का आंकड़ा
अधिवक्ता आशीष प्रताप सिंह बताते हैं कि उस मां की बात उनके मन में बैठ गई। उन्होंने आरटीआई लगाकर वर्ष 2008 से 2020 तक गुम हुई बच्चियों की जानकारी मांगी। सवाल पूछा गया— कितनी बच्चियां गायब हुईं? कितनी वापस मिलीं? और जिन्हें बरामद किया गया, उन्हें किसके सुपुर्द किया गया? लेकिन पुलिस ने जानकारी देने से इनकार कर दिया। जवाब दिया गया कि नाबालिगों की पहचान सार्वजनिक नहीं की जा सकती। अधिवक्ता ने हार नहीं मानी और एसपी कार्यालय में अपील की। वहां से जवाब मिला कि जानकारी करीब 6000 पन्नों में है और इसके लिए 3000 रुपये जमा करने होंगे। जब फीस जमा कराने पहुंचे तो दस्तावेज देने से मना कर दिया गया। काफी बहस के बाद पुलिस ने सिर्फ वर्ष 2016 से 2021 तक का सीमित रिकॉर्ड दिया। इसी रिकॉर्ड में सामने आया कि पांच वर्षों में करीब 800 बच्चियां ऐसी हैं जिनका अब तक कोई पता नहीं चल पाया है।
हाईकोर्ट का सख्त रुख: शासन से मांगा जवाब
अब मामला फिर हाईकोर्ट में है। अदालत ने शासन और पुलिस प्रशासन से पूछा है कि आखिर ऐसी जानकारी साझा करने में दिक्कत क्या है। लेकिन अदालत से बाहर आज भी सबसे बड़ा सच वही है – शहर में 800 बच्चियां सिर्फ आंकड़ा नहीं हैं। वे 800 मांओं की टूटी हुई उम्मीद हैं। 800 घरों की खामोशी हैं और हर रात दरवाजे की तरफ उठती उन नजरों का दर्द हैं, जिन्हें आज भी अपनी बेटी के लौट आने का इंतजार है।
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