इतिहासकारों और शाला की परंपराओं के अनुसार, 18 जून 1858 को अंग्रेजों से युद्ध करते हुए रानी लक्ष्मीबाई गंभीर रूप से घायल हो गई थीं। उनके विश्वस्त सहयोग …और पढ़ें

Publish Date: Sat, 06 Jun 2026 02:23:54 PM (IST)Updated Date: Sat, 06 Jun 2026 02:24:24 PM (IST)

ग्वालियर की गंगादास की शाला: जहां रानी लक्ष्मीबाई की रक्षा में 745 संतों ने दी थी शहादत, आज भी मौजूद है वो ऐतिहासिक तोप
गंगादास की बड़ी शाला का प्राचीन प्रवेश द्वार। नईदुनिया

HighLights

  1. लक्ष्मीबाई बलिदान दिवस पर विशेष
  2. बाबा गंगादास ने निभाए थे रानी को दिए दो ऐतिहासिक वचन
  3. 10 जून से शाला में शुरू होगी श्रीमद्भागवत कथा

नईदुनिया प्रतिनिधि, ग्वालियर। इतिहास के पन्नों में कुछ ऐसे स्थल दर्ज हैं, जो केवल धार्मिक या सांस्कृतिक केंद्र नहीं होते, बल्कि राष्ट्रभक्ति, त्याग और बलिदान की अमर गाथाओं के साक्षी भी हैं। पड़ाव स्थित स्थित श्रीगंगादास की शाला ऐसा ही एक पवित्र स्थान है। यह शाला जहां एक ओर सनातन धर्म, साधना और संत परंपरा का प्रमुख केंद्र है, वहीं दूसरी ओर 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की उन गौरवपूर्ण घटनाओं से जुड़ी है, जिन्होंने भारतीय इतिहास को नई दिशा दी।

वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई के अंतिम दिनों से जुड़ा यह स्थल आज भी राष्ट्रभक्ति और बलिदान की प्रेरणा देता है। इतिहासकारों और शाला की परंपराओं के अनुसार, 18 जून 1858 को अंग्रेजों से युद्ध करते हुए रानी लक्ष्मीबाई गंभीर रूप से घायल हो गई थीं। उनके विश्वस्त सहयोगी उन्हें बाबा गंगादास की शाला लेकर पहुंचे। जीवन की अंतिम घड़ियों में रानी ने बाबा गंगादास से दो महत्वपूर्ण वचन लिए।

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लक्ष्मीबाई कालोनी स्थित बनी गंगादास की बड़ी शाला पर बने संतों के चबूतरे। नईदुनिया

पहला उनके दत्तक पुत्र दामोदर राव की सुरक्षा सुनिश्चित करने का और दूसरा उनकी पार्थिव देह को अंग्रेजों के हाथ न लगने देने का। इस वर्ष भी श्रीगंगादास की शाला में 10 जून से श्रीमद्भागवत कथा का शुभारंभ होगा। यह आयोजन न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र बनेगा, बल्कि उन संतों की अमर गाथा को भी पुनः स्मरण कराएगा, जिन्होंने रानी लक्ष्मीबाई के सम्मान और राष्ट्र की अस्मिता की रक्षा के लिए अपने प्राणों का सर्वोच्च बलिदान दिया था।

वीरांगना के पार्थिव देह तक नही पहुंच सके अंग्रेज: बाबा गंगादास ने इन दोनों वचनों को निभायै। इसके बाद जो हुआ, वह भारतीय संत परंपरा के इतिहास में अद्वितीय उदाहरण माना जाता है। मुट्ठीभर संन्यासियों और साधुओं ने अंग्रेजी सेना के सामने डटकर मुकाबला किया। उनका उद्देश्य केवल इतना था कि रानी की देह शत्रुओं के हाथों में न पहुंचे। इस संघर्ष में शाला से जुड़े लगभग 745 संतों ने अपने प्राणों की आहुति दे दी।

इन संतों ने भजन -कीर्तन करने वाले संसाधनों को हथियार बनाकर अंग्रेजी फौज का मुकाबला किया। गंगादास की शाला से संतों की तोप उनके प्राणों के साथ देने तक गरजती रही। आज भी यह ऐतिहासिक तोप गंगादास की शाला में मौजूद हैं। इसका पूजन विजय दशमी पर होता है और संत इसका प्रदर्शन भी करते हैं।

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