नईदुनिया प्रतिनिधि, ग्वालियर। ग्वालियर में गर्मी बढ़ने के साथ ही हजारों किलोमीटर की दूरी तय कर आए प्रवासी परिंदे अपने वतन लौट चुके हैं। इन्हें तिघरा, महाराजपुरा, अलापुर डैम, भदावना, नलकेश्वर आदि वाटरबाडी पर देखा गया था। ये पक्षी लगभग 30 प्रजाति के थे और इनकी संख्या लगभग सात हजार से अधिक थी।

यूरोप, साइबेरिया, मंगोलिया से आए थे…

ये पक्षी यूरोप, साइबेरिया, मंगोलिया, चाइना, जापान और कनाडा से आए थे। इसके अलावा कुछ भारतीय पक्षी भी थे जो लद्दाख आदि ठंडी जगहों से आए थे। अब ये परिंदे नवंबर में फिर से आएंगे। वहीं दूसरे प्रदेशों से पक्षी ग्वालियर आ चुके हैं, जो जून तक ग्वालियर में रहेंगे।

वेस्टर्न घाट्स में बारिश जल्दी शुरू होने ये आए यहां

पक्षी विशेषज्ञ संजय दत्त शर्मा ने बताया कि विदेशी पक्षी भले ही अपने देश लौट चुके हों, लेकिन लोकल माइग्रेटरी पक्षी ग्वालियर आ चुके हैं। इनमें ओरियोल, इंडियन पिट्टा या नाैरंगा, दूधराज और सवाना नाइटजार शामिल हैं।

ये पक्षी वेस्टर्न घाट्स यानी केरल, कर्नाटका के वेस्टर्न पार्ट, गोवा का बार्डर एरिया से आते हैं। ये पक्षी जून के अंतिम सप्ताह तक यहां दिखेंगे। इसके बाद वापस लौट जाएंगे। दरअसल इन क्षेत्रों में बारिश जल्दी शुरू हो जाती है, जिस कारण से ये पक्षी अपना रुख इस ओर कर लेते हैं।

प्रदूषण बढ़ने से घट सकते हैं प्रवासी पक्षी

पक्षी विशेषज्ञ गौरव परिहार ने बताया कि प्रवासी पक्षी ग्वालियर आना पसंद करते हैं। क्योंकि यहां उनके खाने-पीने और रहने का समुचित प्रबंध है। लेकिन समय के साथ चीजें खत्म होती जा रही हैं। वाटर बाडी कम होती जा रही है। प्रदूषण का ग्राफ लगातार बढ़ता जा रहा है। पेड़ों को कांटा जा रहा है। इससे उनके जीवन पर संकट मंडरा रहा है। यदि यही स्थिति रही, तो आने वाले समय में प्रवासी पक्षियों का ग्वालियर आना कम हो जाएगा।

वर्ष में दो बार मनाया जाता है यह दिवस

विश्व प्रवासी पक्षी दिवस हर साल दो बार मई और अक्टूबर के दूसरे शनिवार को मनाया जाता है। यह एक वैश्विक अभियान है, जो प्रवासी पक्षियों के संरक्षण और उनके आवास की सुरक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ाता है। इस दिवस का उद्देश्य प्रवासी पक्षियों के सामने आने वाली समस्याओं जैसे जलवायु परिवर्तन, आवास की हानि के बारे में जागरूकता बढ़ाना है। इस अभियान की शुरुआत वर्ष 2006 में संयुक्त राष्ट्र के सहयोग से की गई थी। यह दिन पक्षियों के प्रवास की मौसमी प्रकृति उत्तरी और दक्षिणी गोलार्द्ध को दर्शाता है।

ये पक्षी जा चुके : ब्लू थ्रोट, ग्रे लेग गूज, रेड नेक्ड फाल्कन, ग्रेट थिकनी, लिटिल रिंग्ड प्लोवर, ब्लैक हेडेड गल, गेड़वाल, ब्लैक स्टार्क, कामन क्रेन, क्रेस्टेड ग्रीब, कूटए स्पून बिल, ग्रेट कारमोरेंट, येलो वैगटेलए ब्लैक रेडस्टार्ट।

एक नजर में: दिसंबर-जनवरी में विदेश में तापमान माइनस डिग्री से काफी कम होने, लगातार बर्फबारी होने, पानी जम जाने की वजह से पक्षियों के खाने और पानी में संकट पैदा हो जाता है। इस कारण से ये पक्षी माइग्रेट होकर भारत की ओर रुख कर लेते हैं। वहीं ग्वालियर में वाटरबाडी काफी है। इसलिए पक्षियों के रहवास और खाने-पानी का प्रबंध है।



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