प्रदेश सरकार ने प्रदेशभर में कार्यरत करीब पांच हजार पेसा मोबिलाइजर्स की सेवाएं समाप्त करने का फैसला लिया है। पंचायत राज संचालनालय की ओर से जारी आदेश में सभी जिलों के मुख्य कार्यपालन अधिकारियों को तत्काल प्रभाव से कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए हैं। इस निर्णय से आदिवासी क्षेत्रों में काम कर रहे हजारों युवाओं की नौकरी पर असर पड़ा है। जानकारी के मुताबिक पेसा एक्ट लागू होने के बाद जनजातीय क्षेत्रों की ग्राम सभाओं को मजबूत बनाने, ग्रामीणों को सरकारी योजनाओं से जोड़ने और पंचायत स्तर पर जागरूकता बढ़ाने के लिए पेसा मोबिलाइजर्स नियुक्त किए गए थे। ये कर्मचारी गांवों में ग्राम सभा आयोजन, सरकारी योजनाओं की जानकारी पहुंचाने और स्थानीय विवादों के समाधान में सहयोग करते थे। पंचायत राज संचालनालय ने अपने आदेश में कहा है कि भारत सरकार की आरजीएसए योजना 1 अप्रैल 2022 से 31 मार्च 2026 तक लागू थी। इसी योजना के तहत मिलने वाले बजट से पेसा मोबिलाइजर्स को मानदेय दिया जाता था। अब योजना की अवधि समाप्त हो चुकी है और केंद्र सरकार स्तर पर नई नीति बनने की प्रक्रिया जारी है। ऐसे में फिलहाल इन सेवाओं को जारी रखना संभव नहीं माना गया है।
ये भी पढ़ें- Twisha Sharma Death Case: ‘मैं फंस गई हूं यार’, मौत से पहले ट्विशा का सहेली को दर्दभरा मैसेज, खुल रहे कई राज
इन जिलों पर पड़ेगा असर
यह निर्णय विशेष रूप से उन आदिवासी जिलों को प्रभावित करेगा जहां पेसा एक्ट लागू है। इनमें झाबुआ, आलीराजपुर, बड़वानी, मंडला, डिंडोरी, अनुपपुर, धार, खरगोन, रतलाम, खंडवा, बैतूल, छिंदवाड़ा, बालाघाट, शहडोल, उमरिया और श्योपुर जैसे जिले शामिल हैं।
ये भी पढ़ें- Twisha Sharma Death: कौन थीं ट्विशा शर्मा? मिस पुणे रहीं, फिल्मों में किया काम, शादी के पांच महीने बाद मौत
2024 में मानदेय बढ़ाकर किया था 8 हजार रुपये
बता दें, मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने अक्टूबर 2024 में पेसा मोबिलाइजर्स का मानदेय 4 हजार से बढ़ाकर 8 हजार रुपए करने की घोषणा की थी। हालांकि, केंद्र से बजट स्वीकृति नहीं मिलने के कारण यह फैसला लागू नहीं हो पाया।
ये भी पढ़ें- Twisha Sharma Death Case: ‘मेरी बेटी को इंसाफ चाहिए’ ट्विशा के माता-पिता का फूटा दर्द, बोले- उसे मार दिया गया
शिवराज के कार्यकाल में हुई थी शुरुआत
मध्य प्रदेश में पेसा एक्ट की शुरुआत पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के कार्यकाल में हुई थी। वर्ष 2022 में शहडोल से इसका औपचारिक शुभारंभ किया गया था। प्रदेश के 20 जिलों की 5254 पंचायतों और हजारों गांवों में यह व्यवस्था लागू की गई थी, जिसका उद्देश्य आदिवासी ग्राम सभाओं को अधिक अधिकार और प्रशासनिक भागीदारी देना था।
