मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग (एमपीपीएससी) और राज्य सरकार के विभिन्न विभागों के बीच समन्वय की कमी को लेकर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की ऑडिट रिपोर्ट में गंभीर खामियां सामने आई हैं। रिपोर्ट में बताया गया है कि रिक्त पदों की सूचना समय पर न देने और प्रक्रियागत कमजोरियों के कारण भर्ती में लंबी देरी हुई, जिससे योग्य अभ्यर्थियों को नुकसान उठाना पड़ा। ऑडिट में उल्लेख किया गया कि उच्च शिक्षा विभाग ने “दिव्यांगजन” के लिए आरक्षित पदों में बार-बार बदलाव किया, जिससे चयन प्रक्रिया में चार वर्ष तक की देरी हुई। वहीं, परिवहन विभाग ने सहायक क्षेत्रीय परिवहन अधिकारी (एआरटीओ) के 13 पदों के लिए दो बार मांग भेजी, जिस पर आयोग ने चयन भी कर लिया। इससे आयोग और विभाग दोनों स्तरों पर आंतरिक नियंत्रण प्रणाली की कमजोरी उजागर हुई।

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समयसीमा तय नहीं, 101 रिक्तियों में भारी देरी

ऑडिट में पाया गया कि आयोग ने विभागों से रिक्त पदों की जानकारी लेने के लिए कोई निश्चित समयसीमा तय नहीं की। कई मामलों में आयोग ने सक्रिय रूप से मांग भी नहीं की। कुल 101 रिक्तियों की जानकारी 31 से 68 माह की देरी से भेजी गई। इसके अलावा, मांग पत्रों में दर्शाई गई रिक्तियां सरकार की आरक्षण नीति के अनुरूप हैं या नहीं, इसकी जांच के लिए भी कोई प्रभावी आंतरिक व्यवस्था नहीं थी।

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स्पष्टीकरण में देरी, भर्ती प्रक्रिया प्रभावित

विभागों से मांगे गए स्पष्टीकरण 6, 12 और 18 माह तक लंबित रहे, जो क्रमशः एक-स्तरीय, द्वि-स्तरीय और त्रि-स्तरीय परीक्षाओं से संबंधित थे। एक मामले में तो विज्ञापन जारी करने में 20 माह का समय लग गया। ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार, 2018-19 से 2022-23 के बीच 44 प्रस्तावित परीक्षाओं के मुकाबले केवल 28 परीक्षाएं आयोजित की गईं, जो आयोग की प्लानिंग में कमी को दर्शाता है। 94 विज्ञापनों में से 30 मामलों में विज्ञापन जारी करने में औसतन 136 दिन की देरी पाई गई।

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चयन प्रक्रिया में 25 माह तक की देरी

चयन प्रक्रियाएं निर्धारित समयसीमा के मुकाबले 1 से 25 माह तक विलंब से पूरी की गईं। प्रतीक्षा सूची से संबंधित कमजोर व्यवस्था के कारण सात अभ्यर्थियों की नियुक्ति वैधता अवधि के भीतर नहीं हो सकी, जबकि पांच उम्मीदवार विभागीय स्तर पर नियुक्ति निरस्त करने में देरी के कारण अवसर से वंचित रह गए।

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वित्तीय प्रबंधन भी सवालों के घेरे में

रिपोर्ट में वित्तीय प्रबंधन को भी कमजोर बताया गया है। वर्ष 2018-19 से 2022-23 के बीच आयोग ने अपने आवंटित बजट का 42 प्रतिशत हिस्सा वापस कर दिया, जो संसाधनों के प्रभावी उपयोग में कमी को दर्शाता है।

 



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