मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर बेंच ने एक दिलचस्प और समाज को संदेश देने वाला आदेश पारित किया है। …और पढ़ें

Publish Date: Mon, 20 Apr 2026 09:41:22 PM (IST)Updated Date: Mon, 20 Apr 2026 09:41:22 PM (IST)

ग्वालियर हाईकोर्ट की अनूठी पहल... HC के आदेश पर अब आश्रय गृह में समय बिताएंगे वकील और फरियादी
ग्वालियर हाईकोर्ट की अनूठी पहल

नईदुनिया प्रतिनिधि, ग्वालियर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर बेंच ने एक दिलचस्प और समाज को संदेश देने वाला आदेश पारित किया है। जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस पुष्पेंद्र यादव की खंडपीठ ने एक मामले को बहाल करते हुए आवेदक और उसके वकील को समाज सेवा करने की सलाह दी है। मामला अभ्देश शर्मा द्वारा दायर याचिका से जुड़ा है, जिसमें उन्होंने पहले खारिज हो चुके अपने केस को फिर से शुरू करने की मांग की थी। उनके वकील आनंद पुरोहित ने कोर्ट को बताया कि 24 फरवरी 2025 के आदेश के तहत उन्हें कुछ शर्तें पूरी करनी थीं, लेकिन गलती से उनका पालन नहीं हो पाया। उन्होंने इसे अनजाने में हुई गलती बताया।

सजा नहीं, सामाजिक जिम्मेदारी, मर्सी होम में बिताएंगे समय

कोर्ट ने इस कारण को सही मानते हुए याचिका स्वीकार कर ली और केस को बहाल करने का आदेश दे दिया। लेकिन इसके साथ ही कोर्ट ने एक अनोखा सुझाव भी दिया। कोर्ट ने कहा कि आवेदक और उनके वकील ग्वालियर के एक मर्सी होम (आश्रय स्थल) में जाकर कम से कम एक घंटा समय बिताएं। वहां रहने वाले बच्चों और जरूरतमंद लोगों के साथ समय बिताने के साथ-साथ करीब 2500 रुपये के फल या नाश्ता भी लेकर जाएं। कोर्ट ने साफ किया कि यह कोई सजा नहीं है, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का एक प्रयास है। इस सुझाव को आवेदक के वकील ने तुरंत स्वीकार भी कर लिया और भरोसा दिलाया कि वे एक महीने के भीतर यह कार्य करेंगे।

सोशल ऑडिट की पहल, प्रबुद्ध वर्ग की भागीदारी पर जोर

हाईकोर्ट ने इस पहल को सोशल ऑडिट की शुरुआत बताते हुए कहा कि समाज के जिम्मेदार लोग- जैसे वकील, डॉक्टर, अधिकारी को ऐसे स्थानों पर जाकर वहां के हालात देखने चाहिए। इससे जरूरतमंद लोगों को सहारा मिलेगा और संस्थाओं की कार्यप्रणाली भी बेहतर होगी। कोर्ट ने यह भी कहा कि कई बार ऐसी संस्थाओं में रहने वाले लोगों के साथ गलत व्यवहार की शिकायतें आती हैं, इसलिए समाज की निगरानी जरूरी है। अदालत ने निर्देश दिया कि मर्सी होम की यात्रा के बाद आवेदक और उनके वकील अपनी रिपोर्ट भी कोर्ट में पेश करें। इसके बाद ही केस पूरी तरह बहाल माना जाएगा।

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