ग्वालियर पॉक्सो कोर्ट ने छह साल पुराने गैंगरेप मामले में पीड़िता के बयान से मुकरने, साक्ष्य के अभाव और उम्र प्रमाण न होने पर आरोपी पवन बघेल को बरी किय …और पढ़ें

Publish Date: Sat, 18 Apr 2026 10:53:31 AM (IST)Updated Date: Sat, 18 Apr 2026 10:59:41 AM (IST)

ग्वालियर में छह साल पुराने गैंगरेप केस में मुकर गई पीड़िता, बोली- कुछ गलत नहीं हुआ, आरोपी बरी
पॉक्सो कोर्ट में करीब छह साल पुराने गैंगरेप मामले में बड़ा मोड़।

HighLights

  1. छह साल पुराने गैंगरेप मामले में आरोपी कोर्ट से बरी।
  2. पीड़िता ने अदालत में अपने पुराने आरोपों से साफ इनकार।
  3. मां और चाचा ने भी आरोपों का समर्थन नहीं किया।

नईदुनिया प्रतिनिधि, ग्वालियर। ग्वालियर की पॉक्सो कोर्ट में करीब छह साल पुराने गैंगरेप मामले में बड़ा मोड़ सामने आया है। अदालत ने पीड़िता के बयान से मुकर जाने और पर्याप्त साक्ष्य के अभाव में मुख्य आरोपी पवन बघेल को सभी आरोपों से बरी कर दिया। विशेष न्यायाधीश वंदना राज पाण्डेय की अदालत ने 17 अप्रैल को यह फैसला सुनाया।

यह मामला 25 मार्च 2020 का बताया गया था। उस समय डबरा थाना क्षेत्र में पीड़िता के चाचा और उसकी मां ने शिकायत दर्ज कराई थी कि पवन बघेल उसे बहला-फुसलाकर अपने साथ ले गया और अन्य लोगों के साथ मिलकर दुष्कर्म किया।

पुलिस ने इस मामले में पवन बघेल के अलावा सोनू सलमान और प्रदीप परिहार को भी आरोपी बनाया था। इन तीनों आरोपियों को पहले ही 7 जुलाई 2023 को साक्ष्यों के अभाव में बरी किया जा चुका था, जबकि पवन बघेल फरार रहने के कारण उसका फैसला लंबित था।

पीड़िता ने अदालत में बदला बयान

  • सुनवाई के दौरान सबसे बड़ा मोड़ तब आया, जब खुद पीड़िता ने अदालत में बयान दिया कि उसके साथ कोई गलत काम नहीं हुआ था। उसने यह भी कहा कि वह नाराज होकर खुद घर से चली गई थी। इतना ही नहीं, पीड़िता की मां और चाचा ने भी अदालत में पहले लगाए गए आरोपों का समर्थन नहीं किया।
  • मामले की मेडिकल जांच करने वाली डॉक्टरों की रिपोर्ट में भी किसी प्रकार की चोट या जबरदस्ती के स्पष्ट निशान नहीं मिले। हालांकि डीएनए रिपोर्ट में पवन बघेल का मिलान सामने आया, लेकिन अदालत ने कहा कि केवल डीएनए रिपोर्ट के आधार पर दोष सिद्ध नहीं किया जा सकता, खासकर तब जब पीड़िता और उसके परिजन आरोपों से साफ इनकार कर चुके हों।
  • इसके अलावा अदालत ने यह भी माना कि पीड़िता की उम्र 18 वर्ष से कम होने के ठोस प्रमाण पेश नहीं किए जा सके, जिससे पॉक्सो एक्ट की धाराएं भी लागू नहीं हो सकीं। इन सभी तथ्यों के आधार पर अदालत ने संदेह का लाभ देते हुए आरोपी को बरी कर दिया।


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