इंदौर रेलवे स्टेशन के कोचिंग डिपो परिसर में बरसों पुराने कचरे का पहाड़ बढ़ता ही जा रहा है। बारिश सिर पर है और जिम्मेदारों की लापरवाही बढ़ती ही जा रही है। तेज बारिश की स्थिति में कोचिंग डिपो में जमा यह कचरा और भी परेशानी खड़ी कर देगा। न सिर्फ इससे आसपास गंदगी फैलेगी बल्कि बाद में यहां की साफ सफाई करने में भी रेलवे के पसीने छूट जाएंगे। दूसरी तरफ ट्रेनों के आसपास भी सीवरेज और गंदगी के यह हाल हैं कि यात्री स्टेशन पर आते ही परेशान हो जाते हैं। सबसे स्वच्छ शहर इंदौर के रेलवे स्टेशन पर इन दिनों जगह जगह गंदगी पसरी हुई है और जिम्मेदार आंखें मूंदकर बैठे हैं। दूसरी तरफ सिंहस्थ 2028 के लिए रेलवे बड़े बड़े दावे कर रहा है लेकिन आज की हकीकत बता रही है कि अधिकारी स्टेशन पर साफ सफाई के लिए बिल्कुल भी गंभीर नहीं हैं।
कचरे का निपटान करने वाली एजेंसी नहीं मिली
रेलवे ने एक महीने पहले यहां पर सफाई शुरू की थी। इस सफाई अभियान के तहत अब तक सैकड़ों टन से अधिक कचरा यहां से बाहर निकाला जा चुका है। इसके बावजूद जमीनी हकीकत यह है कि रोजाना ट्रेनों, अलग-अलग प्लेटफॉर्म और पूरे स्टेशन परिसर से निकलने वाला नया कचरा फिर से उसी जगह पर तेजी से जमा होने लगा है। इस गंभीर लापरवाही की मुख्य वजह यह सामने आई है कि रेलवे ने पुराने कचरे के निपटान की वैकल्पिक व्यवस्था तो कर दी, लेकिन दैनिक रूप से निकलने वाले नए कचरे के नियमित निपटान की जिम्मेदारी संभालने वाली अनुबंधित एजेंसी ने अब तक धरातल पर काम शुरू ही नहीं किया है। नतीजा यह है कि कोचिंग डिपो में कचरे का एक नया जखीरा बनने का खतरा एक बार फिर मंडराने लगा है।
प्रशासनिक अनदेखी से प्लांट के बाहर बना कचरे का डंपिंग ग्राउंड
लंबे समय से रेलवे स्टेशन के सभी छह प्लेटफॉर्म, मुख्य स्टेशन परिसर और लंबी दूरी की ट्रेनों से साफ-सफाई के दौरान निकलने वाले भारी कचरे को कोचिंग डिपो में बने सेग्रिगेशन प्लांट के ठीक बाहर डंप किया जा रहा था। लंबे समय तक रेलवे के जिम्मेदार अधिकारियों ने इस विकट समस्या की ओर कोई ध्यान नहीं दिया, जिससे स्टेशन के एक हिस्से में स्थिति लगातार बद से बदतर होती चली गई। करीब एक महीने पहले जब मामला प्रशासनिक स्तर पर गरमाया, तब जाकर रेलवे प्रशासन हरकत में आया। आनन-फानन में नगर निगम के माध्यम से प्रतिदिन कचरा उठाने की अंतरिम व्यवस्था शुरू की गई और कोटेशन प्रक्रिया के आधार पर ग्वालियर क्षेत्र के एक नए कॉन्ट्रैक्टर को प्लांट के भीतर तथा बाहर जमा पुराने कचरे के निपटान का काम सौंपा गया।
पुराना कचरा हटा रहे, नए के लिए कोई व्यवस्था नहीं, इससे बढ़ रही परेशानी
इस पूरे मामले का सबसे चिंताजनक और तकनीकी पहलू यह है कि एक तरफ जहां पुराने कचरे को हटाने की धीमी प्रक्रिया जारी है, वहीं दूसरी तरफ हर दिन स्टेशन से निकलने वाले नए कचरे के वैज्ञानिक निपटान की व्यवस्था आज भी पूरी तरह से अधर में लटकी है। कोटेशन के आधार पर काम कर रहे अस्थायी कॉन्ट्रैक्टर के कर्मचारियों ने स्पष्ट किया है कि उनके अनुबंध की शर्तों के अनुसार उनका कार्य केवल पहले से जमा पड़े पुराने कचरे को डंपिंग साइट से हटाना है। वर्तमान में जो कचरा प्रतिदिन स्टेशन से निकल रहा है, उसे उठाने की नैतिक और कानूनी जिम्मेदारी उस मुख्य एजेंसी की है, जिसे रेलवे द्वारा नियमित कचरा प्रबंधन का दीर्घकालिक टेंडर दिया गया है। कोचिंग डिपो में चौबीसों घंटे तैनात रहने वाले रेलवे कर्मचारियों का भी साफ तौर पर मानना है कि यदि नए कचरे का समय रहते सही तरीके से निपटान शुरू नहीं हुआ, तो चंद दिनों के भीतर यहां फिर से कचरे का पुराना रूप देखने को मिलेगा।
जल्द हटवाएंगे कचरा
रतलाम मंडल के जनसंपर्क अधिकारी मुकेश कुमार ने कहा कि अभी एजेंसी फाइनल हुई है या नहीं यह जानकारी हमें नहीं मिली है। हम जल्द से जल्द यहां पर आ रही परेशानियों को दूर करके व्यवस्था को बेहतर बनाएंगे। इसके लिए अधिकारियों से लगातार बात की जा रही है।
