धार की भोजशाला को लेकर गुरुवार को हुई सुनवाई में पक्षकार मौलाना कमालुद्दीन सोसायटी के वकील तौसीफ वारसी ने अपना पक्ष रखा। उन्होंने दलील दी कि भोजशाला में मां सरस्वती की मूर्ति कभी थी ही नहीं। वारसी ने कहा कि ब्रिटिश म्यूजियम में जिस मूर्ति को मां सरस्वती का बताया जाता है, वह वास्तव में मां अंबिका की है। अपने दावे के समर्थन में उन्होंने ब्रिटिश उच्चायोग के सर रॉब यंग द्वारा पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को लिखे गए पत्र का हवाला भी दिया।

 

वकील वारसी ने आगे कहा कि धार में ‘भोजशाला’ का अस्तित्व कभी नहीं था, बल्कि वहां शुरू से ‘कमाल मौला मस्जिद’ रही है। उन्होंने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के रुख पर भी सवाल उठाए। उन्होंने तर्क दिया कि दो अलग-अलग याचिकाओं में विभाग के जवाब अलग-अलग रहे हैं, जबकि सरकार का रुख स्पष्ट होना चाहिए और वह समय के साथ बदलना नहीं चाहिए।

 

गुरुवार को बहस अधूरी रही, अब सोमवार को वकील वारसी अपनी दलीलें जारी रखेंगे। इसके बाद अधिवक्ता सलमान खुर्शीद एएसआई द्वारा सर्वे के दौरान की गई वीडियोग्राफी पर अपना पक्ष रखेंगे। गौरतलब है कि मुस्लिम पक्ष ने सर्वे की वीडियोग्राफी मुहैया न कराए जाने पर सुप्रीम कोर्ट की शरण ली थी, लेकिन कोर्ट ने हस्तक्षेप से इनकार कर दिया था। बाद में जब हाईकोर्ट में यह मांग दोहराई गई, तो कोर्ट ने सभी पक्षकारों को वीडियोग्राफी मुहैया कराने के निर्देश दिए। दो दिन पहले ही सभी पक्षकारों को भोजशाला की वीडियोग्राफी के फुटेज दे दिए गए हैं।

 

बता दें कि इस मामले में पिछले 25 से ज्यादा दिनों से सुनवाई जारी है। भोजशाला को लेकर कुल पांच याचिकाएं दायर की गई हैं, वहीं कुछ अन्य हस्तक्षेपकर्ताओं ने भी कोर्ट से अपना पक्ष रखने का आग्रह किया है। कोर्ट बारी-बारी से सभी पक्षकारों को अपनी बात रखने का मौका दे रही है।



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