नईदुनिया प्रतिनिधि, ग्वालियर। कुछ मुकदमे केवल कानूनी लड़ाई नहीं होते, वे इंसानी दर्द, उम्मीद और न्याय की तलाश की ऐसी कहानी बन जाते हैं जो जीवनभर याद रहती है। मेरे लिए वर्ष 2016 का एक अपहरण एवं हत्याकांड ऐसा ही एक मुकदमा रहा, जिसे मैं आज भी भूल नहीं पाया हूं। इस मामले ने मुझे एक अधिवक्ता के साथ-साथ एक पिता और इंसान के रूप में भी भीतर तक झकझोर दिया था।
इस मुकदमे को अपने यादगार मुकदमे के तौर पर बताते हुए अधिवक्ता सचिन अग्रवाल भावुक हो गए। वह बताते हैं कि आज भी जब वह अपने पेशेवर जीवन के महत्वपूर्ण मुकदमों को याद करते हैं, तो यह हत्याकांड सबसे पहले स्मृति में उभरता है। यह मुकदमा उन्हें हमेशा याद दिलाता है कि अदालतों में केवल कानून की धाराएं नहीं चलतीं, बल्कि वहां इंसानी भावनाएं, टूटे हुए सपने और न्याय की उम्मीदें भी न्याय की प्रतीक्षा करती हैं।
पिता की आंखों में झलका दर्द
अधिवक्ता सचिन बताते हैं कि जब यह मामला उनके पास आया तो पहली बार बच्चे के पिता से मुलाकात हुई। आज भी उनकी आंखों में दिखा दर्द याद है। वह बार-बार सिर्फ एक ही बात कहते थे सर, मेरे बेटे को मार दिया, बस उसे इंसाफ मिलना चाहिए।” एक पिता की यह पुकार किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को विचलित कर सकती थी। मुकदमे की सुनवाई के दौरान जब गवाहों के बयान हुए और घटना की परतें खुलीं, तब कई बार अदालत में मौजूद लोगों की आंखें नम हो गईं। वह स्वयं भी उस पीड़ा को महसूस कर रहे थे।
दोषियों को हुआ दोहरा आजीवन कारावास
लंबी सुनवाई और साक्ष्यों के परीक्षण के बाद न्यायालय ने सभी दोषियों को दोषी ठहराते हुए दोहरे आजीवन कारावास की सजा सुनाई। यह फैसला कानून की जीत था और मासूम बच्चे के लिए न्याय भी। लेकिन इस फैसले की खुशी अधूरी रह गई, क्योंकि जिस पिता ने अपने बेटे के लिए न्याय की लड़ाई शुरू की थी, वह फैसला आने से पहले ही दुनिया छोड़ चुका था। बेटे की हत्या का सदमा पिता सहन नहीं कर पाए। समय के साथ उनकी सेहत लगातार बिगड़ती गई और आखिरकार उन्होंने भी दम तोड़ दिया। यह इस मुकदमे का सबसे दर्दनाक पहलू था। एक पिता जिसने अपने इकलौते बेटे को खोया, वह उसे इंसाफ मिलता देखने तक जीवित नहीं रह सका।
ऐसे समझें मामला
29 जून 2016 की सुबह ग्वालियर के गोला का मंदिर क्षेत्र में रहने वाला 13 वर्षीय बालक रोज की तरह साइकिल से कोचिंग पढ़ने गया था। किसी ने नहीं सोचा था कि वह घर वापस नहीं लौटेगा। शाम तक जब वह घर नहीं पहुंचा तो परिवार की चिंता बढ़ गई। स्वजन ने रिश्तेदारों, दोस्तों और परिचितों के यहां तलाश की लेकिन उसका कोई पता नहीं चला। अंततः उसके पिता ने थाने में गुमशुदगी दर्ज कराई।
फोन पर धमकी मिली
अभी परिवार बेटे की तलाश में परेशान ही था कि उसी शाम बच्चे के पिता के मोबाइल पर एक फोन आया। फोन करने वालों ने बताया कि उन्होंने बच्चे का अपहरण कर लिया है और उसे जिंदा वापस पाने के लिए 10 लाख रुपये की फिरौती देनी होगी। एक पिता के लिए इससे बड़ा दुःस्वप्न क्या हो सकता था। उन्होंने अपहरणकर्ताओं से अपने बेटे से बात कराने की गुहार लगाई, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया।
डर के चलते मार दिया
जांच में सामने आया कि अपहरणकर्ताओं को डर था कि बच्चा उन्हें पहचान चुका है। यहीं से इस अपराध ने और भी भयावह रूप ले लिया। पहचान उजागर होने के डर से आरोपितों ने मासूम बच्चे की गला घोंटकर हत्या कर दी। हत्या के बाद उसके शव को एक बोरे में भरकर बिरला अस्पताल के पास एक चैंबर में फेंक दिया गया, जबकि उसकी साइकिल और अन्य सामान शहर के अलग-अलग इलाकों में ठिकाने लगा दिए गए ताकि पुलिस को गुमराह किया जा सके।
