मध्य प्रदेश में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) को लेकर चल रही परामर्श प्रक्रिया के दौरान मुस्लिम प्रतिनिधियों ने मुस्लिम पर्सनल लॉ में किसी भी प्रकार के बदलाव का विरोध किया है। उनका कहना है कि मुस्लिम समुदाय के अपने धार्मिक और पारिवारिक कानून हैं, जिनमें हस्तक्षेप उचित नहीं होगा। उन्होंने यह भी कहा कि यूसीसी को लागू करने के विषय पर भविष्य में विचार किया जा सकता है। सोमवार को आरसीवीपी नरोन्हा प्रशासन एवं प्रबंधन अकादमी में आयोजित राज्य स्तरीय बैठक में विभिन्न सामाजिक और धार्मिक संगठनों के प्रतिनिधियों ने अपने सुझाव और आपत्तियां दर्ज कराईं। 

बैठक में शामिल इस्लामिक विद्वान हाजी हारून ने कहा कि समान नागरिक संहिता और मुस्लिम पर्सनल लॉ दोनों अलग-अलग विषय हैं। उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा कि जब मुस्लिम पर्सनल लॉ पहले से लागू है तो उसे समाप्त करने की चर्चा क्यों की जा रही है। उन्होंने कहा कि मुस्लिम समाज अपनी परंपराओं और विवाह संबंधी व्यवस्थाओं के अनुसार जीवन जीता है, इसलिए यूसीसी को लेकर उनकी चिंताएं स्वाभाविक हैं। 

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हाजी हारून ने यूसीसी के मसौदे में शामिल लिव-इन रिलेशनशिप संबंधी प्रावधान का भी विरोध किया। उनका कहना था कि यह भारतीय सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों के अनुरूप नहीं है तथा यह अवधारणा विदेशी समाजों से प्रभावित है। वहीं हिंदू उत्सव समिति ने भी लिव-इन रिलेशनशिप के प्रावधान पर आपत्ति जताई। समिति के प्रतिनिधि चंद्रशेखर तिवारी ने मांग की कि इस प्रावधान को प्रस्तावित कानून से हटाया जाए, क्योंकि इससे भारतीय पारिवारिक व्यवस्था और सामाजिक ढांचे पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। जानकारी के अनुसार, यूसीसी समिति की बैठकों में मुस्लिम प्रतिनिधियों ने यह मांग भी उठाई है कि जिस प्रकार कुछ राज्यों में आदिवासी समुदायों को यूसीसी के दायरे से बाहर रखने पर विचार किया गया है, उसी प्रकार मुस्लिम समुदाय को भी विशेष छूट दी जाए। राज्य सरकार द्वारा यूसीसी को लेकर विभिन्न वर्गों और संगठनों से सुझाव लिए जा रहे हैं। इन सुझावों और आपत्तियों के आधार पर समिति अपनी अंतिम रिपोर्ट तैयार करेगी। 

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