नईदुनिया प्रतिनिधि, ग्वालियर। वकालत के पेशे में कई ऐसे मुकदमे आते हैं जो केवल कानूनी विवाद नहीं होते, बल्कि इंसानी जज्बात, संघर्ष और न्याय की गहरी कहानी बन जाते हैं। ऐसा ही एक मामला मेरे जीवन का यादगार मुकदमा है, जिसमें एक महिला डाक्टर ने अपने सम्मान और स्वतंत्रता के लिए 14 वर्षों तक कानूनी लड़ाई लड़ी।

अशोकनगर का है मामला

यह मामला अशोकनगर निवासी प्रभा जैन (परिवर्तित नाम) का था। प्रभा एक शिक्षित, आत्मनिर्भर और सफल डाक्टर थीं। मेडिकल पेशे में प्रतिष्ठा और सम्मान अर्जित करने वाली इस महिला ने कभी नहीं सोचा था कि प्रेम विवाह का एक फैसला उन्हें वर्षों तक मानसिक पीड़ा और अदालतों के चक्कर लगाने पर मजबूर कर देगा। लगभग 14 वर्षों तक इस लड़ाई को लडते हुए अंत में जाकर उन्हें न्याय दिलवाया। इसलिए यह मुकदमा मेरे लिए यादगार बन गया। यह बात हाई कोर्ट के अधिवक्ता एसएस गौतम ने कही।

प्रेम से शुरू हुई कहानी, धोखे पर जाकर खत्म हुई

प्रभा की मुलाकात सुभाष (परिवर्तित नाम) से एक अस्पताल में हुई थी। सुभाष ने अपनी बीमार बहन के इलाज के बहाने उनसे संपर्क बढ़ाया। धीरे-धीरे दोनों के बीच नजदीकियां बढ़ीं और यह रिश्ता विवाह तक पहुंच गया। लेकिन शादी के बाद प्रभा को पता चला कि जिस व्यक्ति को वह चार्टर्ड अकाउंटेंट समझती थीं, उसकी पहचान और दावे वास्तविकता से कोसों दूर थे। रिश्ते की शुरुआत जिन बातों पर हुई थी, वे अधिकांश झूठ साबित हुईं। जब प्रभा ने सवाल उठाए तो जवाब में उन्हें सम्मान नहीं, बल्कि अपमान, मानसिक प्रताड़ना और हिंसा का सामना करना पड़ा। समय के साथ हालात इतने बिगड़ गए कि उनके लिए वैवाहिक जीवन बोझ बन गया।

देश छोड़कर भी नहीं मिली राहत

लगातार तनावपूर्ण माहौल के कारण प्रभा को अपना करियर बचाने के लिए विदेश का रुख करना पड़ा। उन्होंने ओमान में नौकरी शुरू की, लेकिन वहां भी उनका पीछा नहीं छोड़ा गया। परेशान होकर वे वापस भारत लौटीं और दादरा एवं नगर हवेली के एक अस्पताल में कार्य करने लगीं। आरोप था कि वहां भी उनके पति ने पहुंचकर अस्पताल प्रबंधन पर दबाव बनाने की कोशिश की, जिससे उनके पेशेवर जीवन पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। एक सफल डाक्टर, जिसने अपना जीवन मरीजों की सेवा में लगाया था, खुद अपने निजी जीवन में असुरक्षा और भय से जूझ रही थी।

हाई कोर्ट ने भी माना क्रूरता का मामला

फैमिली कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए मामला मध्यप्रदेश हाई कोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ पहुंचा। यहां विस्तृत सुनवाई हुई। अदालत ने पाया कि लगातार झूठ बोलना, मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना देना, महिला के करियर में बाधा उत्पन्न करना और उसका लगातार पीछा करना वैवाहिक क्रूरता की श्रेणी में आता है।हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के निर्णय को बरकरार रखते हुए स्पष्ट किया कि किसी महिला को वर्षों तक ऐसे हालात में जीने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। अदालत ने तलाक की पुष्टि करते हुए प्रभा को वैवाहिक बंधन से मुक्त कर दिया।

कोर्ट ने माना, महिला के साथ क्रूरता हुई

वर्ष 2010 में प्रभा ने अशोकनगर की फैमिली कोर्ट में तलाक की याचिका दायर की। यह कानूनी लड़ाई आसान नहीं थी। मामले की सुनवाई के दौरान कई बार प्रक्रिया लंबी खिंची, तारीखें बढ़ीं और कानूनी अड़चनें सामने आईं। इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। फैमिली कोर्ट ने दोनों पक्षों के साक्ष्यों और परिस्थितियों का परीक्षण करने के बाद वर्ष 2012 में यह माना कि महिला के साथ क्रूरता और मानसिक प्रताड़ना हुई है। इसी आधार पर कोर्ट ने तलाक की डिक्री पारित कर दी।

देर से ही सही, न्याय अवश्य मिलता है

अधिवक्ता एसएस गौतम बताते है कि उनके लिए यह मुकदमा केवल एक केस नहीं था। यह एक महिला के आत्मसम्मान, धैर्य और न्याय में विश्वास की कहानी थी। चौदह वर्षों तक चले संघर्ष के बाद जब उसे न्याय मिला, तब यह केवल एक कानूनी जीत नहीं थी, बल्कि उसके आत्मविश्वास और स्वतंत्र जीवन के अधिकार की भी जीत थी।

यह मामला आज भी उन्हें याद दिलाता है कि अदालतें केवल कानून की किताबों से नहीं चलतीं, बल्कि वहां इंसानियत और न्याय की भावना भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है। यह संघर्ष उन सभी महिलाओं के लिए प्रेरणा है जो अन्याय का सामना कर रही हैं और यह विश्वास बनाए रखना चाहती हैं कि देर से ही सही, न्याय अवश्य मिलता है।



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