नईदुनिया प्रतिनिधि, ग्वालियर। न्यायालयीन प्रकरण में गंभीर लापरवाही बरतने के आरोप में प्रभारी जिला शिक्षा अधिकारी (डीईओ) हरिओम चतुर्वेदी को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया है। स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा जारी आदेश में कहा गया है कि संबंधित अधिकारी ने सक्षम निर्देश प्राप्त होने के बावजूद अपेक्षित कार्रवाई नहीं की गई, जिससे विभागीय कार्यप्रणाली प्रभावित हुई।
जानकारी के अनुसार मामला न्यायालयीन प्रकरण से संबंधित है। इस प्रकरण में 5 जुलाई 2023 को पारित निर्णय के बाद लगभग दो वर्ष उपरांत रिट अपील दायर करने के लिए प्रस्ताव विभाग को भेजा गया था। इसके बाद संचालनालय द्वारा 16 फरवरी 2026 को रिट अपील दायर करने की अनुमति भी प्रदान कर दी गई थी।
आदेश में उल्लेख किया गया है कि न्यायालयीन अवमानना प्रकरण पर हरिओम चतुर्वेदी द्वारा शासन अधिवक्ता से पालन संबंधी अभिमत विभाग को भेजा गया, जबकि विभागीय निर्देशों के अनुसार उन्हें प्रकरण में रिव्यू याचिका दायर करनी थी।
प्रकरण में गंभीर लापरवाही व उदासीनता बरती
सक्षम निर्देश मिलने के बावजूद उन्होंने अपेक्षित कार्रवाई नहीं की और इस महत्वपूर्ण प्रकरण में गंभीर लापरवाही व शासकीय कार्य के प्रति उदासीनता बरती। विभाग ने इसे मध्यप्रदेश सिविल सेवा आचरण नियम 1965 के नियम 3(1), 3(2) एवं 3(3) का उल्लंघन मानते हुए गंभीर कदाचार की श्रेणी में माना है।
इसी आधार पर मध्यप्रदेश सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियम 1966 के नियम 9(1) के तहत कार्रवाई करते हुए उन्हें निलंबित किया गया है। निलंबन अवधि के दौरान हरिओम चतुर्वेदी का मुख्यालय डाइट कार्यालय, ग्वालियर निर्धारित किया गया है। साथ ही उन्हें नियमानुसार जीवन निर्वाह भत्ते की पात्रता रहेगी।
यह था विवादित मामला
मामला डाइट ग्वालियर में पदस्थ वरिष्ठ व्याख्याता अनंत पुंधीर के वेतन पुनर्निर्धारण से जुड़ा था। वर्ष 1996 में वेतन पुनरीक्षण नियम 1998 के तहत उनका वेतन 7100 रुपये निर्धारित किया गया था, बाद में आडिट आपत्ति के आधार पर विभाग ने वर्ष 2012 में उनका वेतन दोबारा तय करते हुए 7100 की जगह 6900 रुपये मान लिया और रिकवरी की कार्रवाई शुरू कर दी।
अनंत पुंधीर ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर विभागीय कार्रवाई को चुनौती दी। मामले की सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति मिलिंद रमेश फड़के की एकलपीठ ने माना कि 18 सितंबर 1996 को याचिकाकर्ता का मूल वेतन 2300 रुपये था और वेतन पुनरीक्षण नियमों के अनुसार उनका संशोधित वेतन 7100 रुपये ही बनता था।
कोर्ट ने आदेश दिया कि विभाग सेवा रिकार्ड से गलत प्रविष्टियां हटाए तथा किसी प्रकार की रिकवरी न की जाए। साथ ही 18 सितंबर 1996 से 7100 रुपये के अनुसार वेतन लाभ देने के निर्देश भी दिए गए। लेकिन इस आदेश का पालन नहीं होने पर कोर्ट में अवमानना याचिका दायर की गई जो वर्तमान में भी लंबित है।
