कर्नल सोफिया कुरैशी को लेकर विवादित टिप्पणी करने वाले प्रदेश के मंत्री विजय शाह का मामला सुप्रीम कोर्ट के कड़े तेवर के बाद गंभीर हो गया है। शाह के मामले में अब भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व फैसला ले सकता है। जानकारी के अनुसार, मुख्यमंत्री मोहन यादव और भाजपा प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल इस मुद्दे पर केंद्रीय नेतृत्व से चर्चा करेंगे। शाह मामले में हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट दोनों ने ही सख्त रुख अपनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को चार सप्ताह में रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए हैं। हालांकि, अब तक राज्य सरकार ने एसआईटी को विजय शाह के खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति नहीं दी है।
ये भी पढ़ें- MP में UCC की कवायद तेज: जिलों में होगी जनसुनवाई, दिल्ली में समिति की बैठक; आदिवासी प्रावधानों पर मंथन
आदिवासी जनाधार की चिंता
दरअसल, सरकार अपने मंत्री के खिलाफ मुकदमे की अनुमति देने से बच रही है, क्योंकि ऐसा होते ही विजय शाह पर कैबिनेट से इस्तीफा देने का दबाव बढ़ सकता है। भाजपा को यह भी चिंता है कि विजय शाह आदिवासी समुदाय से आते हैं और उनके खिलाफ कार्रवाई का असर पार्टी के जनाधार पर पड़ सकता है। यही वजह है कि मामला लंबे समय से लंबित बना हुआ है।
ये भी पढ़ें- MP Weather Today: एमपी में मौसम का डबल अटैक, कहीं आंधी-बारिश, कहीं 45 डिग्री पार गर्मी, कल से लू का अलर्ट
एसआईटी ने टिप्पणी को आपत्तिजनक माना
बताया जा रहा है कि एसआईटी की प्रारंभिक जांच रिपोर्ट में विजय शाह की टिप्पणी को आपत्तिजनक माना गया है। जांच में यह भी स्पष्ट हुआ कि सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो एआई जनरेटेड नहीं बल्कि असली था। इसी आधार पर एसआईटी ने भारतीय न्याय संहिता की धारा 196(1)(ए) के तहत अभियोजन की अनुमति मांगी है। हालांकि, एसआईटी ने अपनी रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया है कि इस मामले में किसी व्यक्ति ने औपचारिक शिकायत दर्ज नहीं कराई थी। वहीं, सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की कार्रवाई और विजय शाह की ओर से रखे गए पक्ष पर नाराजगी जाहिर की थी।
ये भी पढ़ें- Crime News: फेसबुक की दोस्ती का खूनी अंत, प्रेमिका ने पूर्व प्रेमी के साथ मिलकर ले ली जान
दूसरे आदिवासी नेताओं की व्यापक पहचान नहीं
प्रदेश भाजपा में प्रभावशाली आदिवासी नेतृत्व की कमी लंबे समय से महसूस की जा रही है। पार्टी के भीतर फिलहाल मंत्री विजय शाह को बड़े आदिवासी चेहरे के तौर पर देखा जाता है, हालांकि, उनका प्रभाव मुख्य रूप से निमाड़ क्षेत्र तक सीमित माना जाता है। यही वजह है कि पार्टी उनके मामले में कोई जल्दबाजी में फैसला लेने से बचती नजर आ रही है। भाजपा ने पूर्व सांसद दिलीप सिंह भूरिया की बेटी निर्मला भूरिया को मंत्री बनाया है, लेकिन उनकी कोई व्यापक पहचान नहीं बन पाई। वहीं, इसके अलावा महाकौशल में फग्गन सिंह कुलस्ते और ओमप्रकाश धुर्वे को पार्टी ने प्रमुख आदिवासी चेहरा बनाया, लेकिन उनका प्रभाव भी सीमित ही रहा। इसके अलावा अंतर सिंह आर्य, प्रेम सिंह पटेल और मीना सिंह को भी मंत्री पद देकर नेतृत्व विकसित करने की कोशिश की गई, लेकिन उनका असर अपने-अपने क्षेत्रों से आगे नहीं बढ़ पाया।
ये भी पढ़ें- Bhopal: Himanta Bishwa Sarama पर ये क्या बोल गए MP के पूर्व मंत्री पीसी शर्मा?
47 अजजा सीटों में से 24 भाजपा के पास
प्रदेश की कुल 47 अनुसूचित जनजाति सीटों में से 24 सीटें भाजपा को, 22 कांग्रेस को और एक भारत आदिवासी पार्टी को मिली है। 2018 में 30 आदिवासी सीटें कांग्रेस ने जीती थी। इन सीटों ने ही सरकार बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। बता दें, प्रदेश की कुल जनसंख्या की 22 प्रतिशत आबादी आदिवासी वर्ग की है। यह वर्ग प्रदेश की 80 के करीब विधानसभा सीटों पर सीधा प्रभाव रखता है।
