आज का मनुष्य पहले की किसी भी पीढ़ी से अधिक जुड़ा हुआ दिखाई देता है, किंतु यह जुड़ाव जितना बाहरी है, उतना ही भीतर से विखंडित भी है। मोबाइल स्क्रीन पर लगातार बहते हुए विचार, सूचनाएँ और प्रतिक्रियाएँ हमारे समय की सबसे बड़ी वास्तविकता बन चुके हैं, जहाँ व्यक्ति केवल सूचना का उपभोक्ता नहीं, बल्कि एल्गोरिद्म द्वारा निर्देशित एक प्रतिक्रिया-तंत्र का हिस्सा बनता जा रहा है। इस परिदृश्य में यह प्रश्न अत्यंत प्रासंगिक हो उठता है कि क्या मनुष्य अब अपने विचार स्वयं सोचता है, या वे विचार उसे दिखाए जाते हैं, दोहराए जाते हैं और अंततः उसी के भीतर स्थापित कर दिए जाते हैं?
डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म्स का आधार केवल तकनीक नहीं, बल्कि व्यवहार-विश्लेषण, यानि बिहेवियर एनालिसिस है, जहाँ ‘एल्गोरिद्म’ यह तय करते हैं कि हमें क्या देखना है, किससे सहमत होना है और किन भावनाओं को अधिक बार अनुभव करना है। यह प्रक्रिया इतनी निरंतर है कि व्यक्ति को इसका आभास भी नहीं होता, और वह धीरे-धीरे एक ऐसी मानसिक अवस्था में पहुँच जाता है जहाँ उसकी प्रतिक्रियाएँ स्वाभाविक न होकर पूर्व-निर्धारित होती जाती हैं। ऐसे में स्वतंत्र चेतना और ‘प्रोग्राम्ड’ व्यवहार के बीच की रेखा धुंधली होने लगती है।
व्यक्ति अपने अनुभवों का स्वामी बनता है
ऐसे समय में गौतम बुद्ध का “साक्षी भाव” केवल एक आध्यात्मिक अवधारणा नहीं, बल्कि एक गहरी बौद्धिक और व्यावहारिक आवश्यकता के रूप में सामने आता है। बुद्ध ने जिस सजगता, यानि सम्यक स्मृति की बात की, उसका सार यही था कि मनुष्य अपने विचारों, भावनाओं और प्रतिक्रियाओं को बिना तत्काल प्रतिक्रिया दिए देख सके, समझ सके और उनसे एक दूरी बनाए रख सके। यह दूरी पलायन नहीं, बल्कि जागरूकता की वह अवस्था है जहाँ व्यक्ति अपने अनुभवों का स्वामी बनता है, उनका दास नहीं।
यदि इस सिद्धांत को डिजिटल जीवन पर लागू करें, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि साक्षी भाव एल्गोरिद्मिक नियंत्रण के विरुद्ध एक प्रकार की मानसिक स्वतंत्रता प्रदान कर सकता है। जब कोई व्यक्ति सोशल मीडिया पर किसी उत्तेजक या भावनात्मक सामग्री को देखता है और तुरंत प्रतिक्रिया देने के बजाय उसे केवल देखता है, तो वह उस चक्र को तोड़ देता है, जिस पर पूरा डिजिटल तंत्र आधारित है यानि ध्यान, प्रतिक्रिया और पुनरावृत्ति का चक्र। एल्गोरिद्म उसी सामग्री को अधिक बढ़ावा देते हैं, जिस पर अधिक प्रतिक्रिया मिलती है; अतः साक्षी भाव केवल व्यक्तिगत शांति का साधन नहीं, बल्कि एक प्रकार का डिजिटल प्रतिरोध भी बन सकता है।
प्रभाव का परिणाम
यहाँ यह समझना आवश्यक है कि एल्गोरिद्म का उद्देश्य हमें नियंत्रित करना नहीं, बल्कि हमें अधिक समय तक प्लेटफ़ॉर्म पर बनाए रखना है, क्योंकि उसी में उनका आर्थिक मॉडल निहित है। किंतु इस प्रक्रिया में जो परिणाम उत्पन्न होता है, वह यह है कि व्यक्ति धीरे-धीरे उन विचारों और भावनाओं में फँस जाता है, जिन्हें वह स्वयं नहीं चुनता, बल्कि जिन्हें उसके लिए चुना जाता है। इस संदर्भ में बुद्ध का साक्षी भाव व्यक्ति को यह क्षमता देता है कि वह यह पहचान सके कि कौन-सा विचार उसका अपना है और कौन-सा बाहरी प्रभाव का परिणाम।
बुद्ध का यह दृष्टिकोण आधुनिक विज्ञान और मनोविज्ञान के साथ भी एक रोचक संगति स्थापित करता है। आज न्यूरोसाइंस यह स्वीकार करता है कि मनुष्य की अधिकांश प्रतिक्रियाएँ स्वचालित होती हैं, और उन्हें बदलने के लिए “माइंडफुल अवेयरनेस” आवश्यक है। यह माइंडफुलनेस, जिसे आज वैश्विक स्तर पर मानसिक स्वास्थ्य के एक प्रभावी उपकरण के रूप में अपनाया जा रहा है, वस्तुतः उसी साक्षी भाव का आधुनिक रूप है, जिसकी चर्चा बुद्ध ने ढाई हजार वर्ष पूर्व की थी। इस प्रकार, बुद्ध का दर्शन केवल अतीत की विरासत नहीं, बल्कि वर्तमान की आवश्यकता बनकर उभरता है।
धीरे-धीरे अपनी प्रतिक्रियाओं को नियंत्रित करना
फिर भी, यह प्रश्न बना रहता है कि क्या साक्षी भाव वास्तव में एल्गोरिद्म से मुक्ति दिला सकता है, या यह केवल व्यक्तिगत स्तर तक सीमित एक अभ्यास है। इसका उत्तर सरल नहीं है, क्योंकि डिजिटल संरचना इतनी व्यापक और जटिल है कि उससे पूर्णतः अलग होना संभव नहीं। किंतु यह भी उतना ही सत्य है कि स्वतंत्रता का आरंभ बाहरी संरचनाओं को बदलने से नहीं, बल्कि आंतरिक जागरूकता से होता है। जब व्यक्ति यह समझने लगता है कि वह कब और कैसे प्रभावित हो रहा है, तब वह धीरे-धीरे अपनी प्रतिक्रियाओं को नियंत्रित करने लगता है, और यही नियंत्रण उसे एल्गोरिद्म के प्रभाव से आंशिक रूप से मुक्त करता है।
विचारपूर्वक निर्णय ले सके
इस संदर्भ में साक्षी भाव कोई त्वरित समाधान नहीं, बल्कि एक अनुशासित अभ्यास है, जो निरंतरता और सजगता की माँग करता है। यह अभ्यास व्यक्ति को निष्क्रिय नहीं बनाता, बल्कि उसे अधिक विवेकशील बनाता है, जिससे वह केवल प्रतिक्रिया करने के बजाय विचारपूर्वक निर्णय ले सके। डिजिटल युग में, जहाँ हर क्षण प्रतिक्रिया की अपेक्षा की जाती है, वहाँ ठहरना और देखना ही सबसे बड़ा प्रतिरोध बन सकता है।
गौतम बुद्ध का संदेश तकनीक के विरोध में नहीं, बल्कि चेतना के पक्ष में है। एल्गोरिद्म हमारी दुनिया को प्रभावित कर सकते हैं, लेकिन वे हमारी चेतना को तभी नियंत्रित कर सकते हैं जब हम उसे बिना जागरूकता के उनके हवाले कर दें। साक्षी भाव हमें यह याद दिलाता है कि स्वतंत्रता बाहरी नहीं, बल्कि आंतरिक अवस्था है। और यदि वह जागरूकता हमारे भीतर उपस्थित है, तो कोई भी एल्गोरिद्म हमें पूरी तरह नियंत्रित नहीं कर सकता।
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