धार की भोजशाला को लेकर जारी सुनवाई में गुरुवार को मौलाना कमाल मौला के वंशज मोइनुद्दीन चिश्ती की ओर से वकील नूर अहमद शेख ने तर्क प्रस्तुत किए। उन्होंने कहा कि वंशज होने के नाते इस केस में हस्तक्षेप का अधिकार है। उन्होंने यह भी कहा कि ऐतिहासिक दस्तावेजों के अलावा सनद, राजपत्र और राजकीय अभिलेखों में संबंधित स्थल को मस्जिद परिसर के रूप में मान्यता प्राप्त है। इस तरह के दस्तावेज ऐतिहासिक महत्व के साथ संपत्ति के स्वरूप और उपयोग का निर्धारण भी करते हैं और साक्ष्य के रूप में भी स्वीकार किए जाते हैं।
वकील शेख ने कोर्ट के समक्ष यह भी कहा कि ऋण पुस्तिका व अन्य सरकारी दस्तावेजों में दर्ज खसरा क्रमांक 305 से 321 तक की प्रविष्टियां बताती हैं कि विवादित भूमि व आसपास के खसरे मस्जिद से संबंधित हैं। ये सरकारी दस्तावेज महत्वपूर्ण प्रमाण हैं और इन्हें हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि मोइनुद्दीन उस संपत्ति के प्रत्यक्ष वंशज हैं और उन्हें भोजशाला से जुड़ी याचिका में हस्तक्षेप का अधिकार है। मुस्लिम लॉ का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि किसी भी धार्मिक संपत्ति के मामले में वंशजों को संपत्ति के प्रबंधन और उपयोग का अधिकार रहता है।
उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने इस केस में समय-समय पर अलग-अलग उत्तर प्रस्तुत किए हैं, जो न्यायिक परीक्षण में गंभीर सवाल खड़े करते हैं। वकील ने एएसआई के सर्वेक्षण की वीडियोग्राफी को लेकर आपत्ति जताई और कहा कि सर्वेक्षण प्रक्रिया, उसकी पारदर्शिता और वीडियोग्राफी के तरीकों पर प्रश्नचिह्न हैं।
