नईदुनिया प्रतिनिधि, ग्वालियर। इस साल नौतपा बीतने के बाद जहां उम्मीद थी कि आषाढ़ की शुरुआत अंचल को तरबतर कर देगी, ग्वालियर-चंबल अंचल में मानसून की कछुआ चाल और प्री-मानसून की दगाबाजी ने अन्नदाताओं के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं। जून का महीना खत्म होने को है, लेकिन ग्वालियर शहर और जिला अब भी पानी की फुहारों के लिए तरस रहा है।

हालात यह हैं कि इस बार जून महीने में सामान्य से आधे से भी कम बारिश दर्ज की गई है, जिसका सीधा असर धान की नर्सरी से लेकर अरहर जैसी महत्वपूर्ण खरीफ फसलों पर पड़ना शुरू हो गया है।

आधे से भी कम रहा पानी का ग्राफ

जिले में जून के महीने में औसत वर्षा करीब 80 मिमी के आसपास होती है। लेकिन इस बार आसमान से राहत की जगह सिर्फ मायूसी बरसी है। जून महीने में अब तक केवल 36 मिमी के करीब ही वर्षा रिकॉर्ड की गई है। यानी तय कोटे के मुकाबले 50 फीसदी से भी कम पानी गिरा है। जून की शुरुआत में जब हल्की आंधी-पानी के साथ बौछारें गिरी थीं, तब किसानों को लगा था कि इस बार प्री-मानसून अच्छा रहेगा और खरीफ की फसलों के लिए पर्याप्त नमी मिल जाएगी। लेकिन अब वे खेतों को भी तैयारी नहीं कर पा रहे हैं।

धान की नर्सरी सूखी, अरहर की बुवाई भी थमी

वर्षा न होने और मानसून के समय पर न आने के कारण खेती का पूरा टाइम-टेबल गड़बड़ा रहा है। जिले में बड़े पैमाने पर ली जाने वाली ग्रीष्मकालीन अरहर की बुवाई पूरी तरह ठप पड़ी है। अंचल के केवल वही गिने-चुने किसान अरहर की बोनी कर पाए हैं, जिनके पास खुद के नलकूप, कुएं या सिंचाई के अन्य साधन मौजूद थे। दूसरी तरफ, धान उत्पादक किसान भी भारी असमंजस में हैं, पानी की कमी के चलते वे धान की नर्सरी तैयार नहीं कर पा रहे हैं। खरीफ सीजन की अन्य फसलों के लिए जो खेतों की जुताई और तैयारी इस वक्त तक पूरी हो जानी चाहिए थी, कड़क धूप और सूखी मिट्टी के कारण वह काम भी पूरी तरह अटका हुआ है।

40 हजार हेक्टेयर में दलहन और 95 हजार का कुल लक्ष्य

कृषि विभाग ने इस बार जिले में 95 हजार हेक्टेयर रकबे में धान, करीब 40 हेक्टेयर में अरहर सहित अन्य दलहनी फसलों का लक्ष्य रखा है। अरहर की बुवाई 15 जून से 30 जून के बीच हो जाती है। लेकिन इस बार वर्षा न होने से अरहर की बुवाई पर बुरा असर पड़ा है।

मौसम विभाग की भविष्यवाणी पर टिकीं नजरें

कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक डा. शैलेंद्र सिंह कुशवाह का कहना है कि यदि अगले एक हफ्ते के भीतर अंचल में मानसून सक्रिय नहीं हुआ, तो खरीफ सीजन की फसलों के उत्पादन में गिरावट देखने को मिल सकती है। देरी से बुवाई होने पर फसलों के पकने की अवधि प्रभावित होती है, जिसका सीधा असर रबी सीजन की तैयारियों पर भी पड़ता है।

अरहर सहित अन्य ग्रीष्म कालीन दलहनी फसलें ऐसी हैं, जिनकी बुवाई दूसरे सप्ताह व तीसरे सप्ताह से शुरू हो जाती है। इन फसलों को सितंबर-अक्टूबर तक काट लिया जाता है। इसके बाद गेहूं की फसल होती है। लेकिन इस बार दलहनी फसलों में अरहर जैसी फसल की बुवाई पर असर पड़ रहा है। साथ ही धान की पौध तैयार करने में भी परेशानी आ रही है। – आरबीएस जाटव, उप संचालक कृषि



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