नईदुनिया प्रतिनिधि, ग्वालियर। कुछ मुकदमे कानून की किताबों से आगे बढ़कर संवेदनाओं, उम्मीद और न्याय की मिसाल बन जाते हैं। ऐसा ही एक मामला वर्ष 2009 में सामने आया था, जब अपनी ढाई माह की मासूम बेटी को खो चुके एक पिता ने इंसाफ की ऐसी लड़ाई लड़ी, जिसे आज भी याद किया जाता है। यह केवल एक डॉक्टरों की लापरवाही का मामला नहीं था, बल्कि एक ऐसे पिता की पीड़ा थी जो अपनी बच्ची की मौत का सच जानने के लिए हर दरवाजे पर भटका और आखिरकार अदालत के हस्तक्षेप से उसे न्याय की उम्मीद मिली। यह बात हाईकोर्ट के अधिवक्ता भानू प्रताप सिंह चौहान ने अपना यादगार मुकदमा बताते हुई साझा की।

मामले को जानें

वर्ष 2009 में गुना क्षेत्र के एक पत्रकार की ढाई माह की बेटी अचानक बीमार पड़ गई। चिंतित पिता ने बिना देर किए बच्ची को स्थानीय डॉक्टर के पास पहुंचाया। परिवार को उम्मीद थी कि इलाज के बाद बच्ची जल्द स्वस्थ हो जाएगी, लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। उपचार के दौरान बच्ची की हालत बिगड़ती चली गई और कुछ ही समय में उसकी मौत हो गई। अचानक हुए इस हादसे ने पिता को भीतर तक तोड़ दिया।

बेटी के बिछड़ने का दर्द इतना गहरा था कि वह यह भी भूल गया कि मौत के कारणों की जांच के लिए पोस्टमार्टम कराना आवश्यक होता है। गहरे सदमे में उसने परंपरा के अनुसार अपनी मासूम बेटी को दफना दिया। लेकिन समय बीतने के साथ उसके मन में यह सवाल उठने लगा कि आखिर उसकी बेटी की मौत कैसे हुई। उसे संदेह था कि कहीं उपचार में कोई गंभीर चूक तो नहीं हुई। यही सवाल उसे बेचैन करने लगा और उसे अपनी भूल का एहसास हुआ।

पोस्टमार्टम करवाने लगाया पूरा जोर

इसके बाद शुरू हुआ इंसाफ का संघर्ष। पिता ने पुलिस अधिकारियों से लेकर प्रशासनिक अधिकारियों तक गुहार लगाई कि उसकी बच्ची का शव कब्र से निकालकर पोस्टमार्टम कराया जाए, ताकि मौत के असली कारणों का पता चल सके। लेकिन हर जगह से उसे निराशा ही हाथ लगी। बिना न्यायालय के आदेश के अस्पताल प्रशासन और संबंधित अधिकारियों ने इतने समय बाद शव निकालकर पोस्टमार्टम कराने से मना कर दिया।

प्रशासन ने मोड़ा मुंह तो पिता पहुंचे हाईकोर्ट

जब सभी रास्ते बंद हो गए, तब उस पिता ने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। उसने अदालत से गुहार लगाई कि उसकी बेटी की मौत की सच्चाई सामने लाई जाए। अधिवक्ता भानू चौहान ने अदालत के समक्ष न केवल पिता के दर्द को रखा, बल्कि अपने तर्कों के समर्थन में जम्मू-कश्मीर के एक पुराने मामले का भी हवाला दिया, जिसमें दुष्कर्म और हत्या की शिकार एक युवती के दफनाए गए शव को न्यायिक आदेश पर बाहर निकालकर जांच कराई गई थी।

न्यायालय ने दिया इंसाफ

अदालत ने पूरे मामले को गंभीरता से सुना और माना कि यदि न्याय के हित में आवश्यक हो तो दफनाए गए शव को भी जांच के लिए निकाला जा सकता है। न्यायालय ने ऐतिहासिक आदेश देते हुए 15 दिनों के भीतर बच्ची का शव कब्र से बाहर निकालकर पोस्टमार्टम कराने के निर्देश दिए। साथ ही भोपाल स्थित फोरेंसिक प्रयोगशाला को मामले की जांच कर विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करने के आदेश दिए गए। बाद में हुई जांच में उपचार में गड़बड़ी के संकेत सामने आए। इससे उस पिता को यह संतोष मिला कि उसकी बच्ची की मौत के कारणों की निष्पक्ष जांच हुई और सच सामने लाने का प्रयास किया गया।

पीड़ित पिता की पुकार सुनी

इस मामले को याद करते हुए अधिवक्ता भानु प्रताप सिंह चौहान बताते हैं कि पैरवी के दौरान कई बार भावनाएं हावी हो जाती थीं। एक पिता के दर्द और उसकी बेबसी को देखकर उनका मन भी भर आया था। लेकिन उन्होंने पूरी ताकत के साथ अदालत के सामने पक्ष रखा और आखिरकार न्यायपालिका ने एक पीड़ित पिता की पुकार सुनी। आज भी यह मुकदमा इसलिए याद किया जाता है क्योंकि इसने साबित किया कि न्याय की उम्मीद कभी खत्म नहीं होती। परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, यदि सच की तलाश ईमानदारी से की जाए तो न्यायपालिका अंतिम उम्मीद बनकर सामने खड़ी होती है। एक पिता की जिद, उसकी पीड़ा और न्याय पाने की उसकी चाह ने इस मुकदमे को उन यादगार मामलों में शामिल कर दिया, जिन्हें समय बीतने के बाद भी भुलाया नहीं जा सकता।



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