सिंहस्थ महापर्व से ठीक एक वर्ष पूर्व उज्जैन में इस वर्ष 17 मई से 15 जून तक अधिकमास के रूप में आस्था का विशाल समागम आयोजित होगा। 32 माह 16 दिन के अंतराल के बाद बन रहे इस दुर्लभ संयोग में देशभर से लाखों श्रद्धालुओं के  उज्जैन पहुंचकर चौरासी महादेव, नौ नारायण और सप्त सागर की धार्मिक यात्राएं करेंगे।

17 मई से शुरू होगा प्रथम ज्येष्ठ अधिकमास

ज्योतिषाचार्य पं. सतीश नागर के अनुसार पंचांग गणना के आधार पर इस वर्ष 17 मई से प्रथम ज्येष्ठ अधिकमास का आरंभ होगा। इससे पूर्व यह संयोग वर्ष 1988, 1999, 2007 और 2018 में बन चुका है। अधिकमास की अवधि में विवाह, गृह प्रवेश सहित सभी मांगलिक कार्य वर्जित रहेंगे। इस दौरान श्रद्धालु जप, तप, दान और कल्पवास जैसे आध्यात्मिक अनुष्ठानों में संलग्न रहेंगे।

सोमवती अमावस्या पर होगा समापन

अधिकमास का समापन 15 जून को सोमवती अमावस्या के महासंयोग में होगा। इस दिन शिप्रा नदी और सोमकुंड में पर्व स्नान किया जाएगा। धार्मिक मान्यता के अनुसार सोमवती अमावस्या पर शिप्रा स्नान से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है, जिसके चलते देशभर से हजारों श्रद्धालुओं के उज्जैन पहुंचने की संभावना है।

प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती

अधिकमास के दौरान संभावित भारी भीड़ को देखते हुए प्रशासन के लिए यह एक बड़ी चुनौती होगी। श्रद्धालुओं की संख्या को देखते हुए सिंहस्थ जैसी व्यवस्थाएं अभी से जुटाने की आवश्यकता है। वर्तमान में सप्त सागर एवं कई महादेव मंदिरों के आसपास बुनियादी सुविधाओं और स्वच्छता के अभाव को लेकर चिंता जताई जा रही है। सुगम दर्शन और व्यवस्था के लिए शासन-प्रशासन को समय रहते विस्तृत कार्ययोजना तैयार करनी होगी।

ये धार्मिक यात्राएं रहेंगी विशेष



चौरासी महादेव यात्रा:

मान्यता है कि उज्जैन के 84 महादेव मंदिर सौरमंडल के 84 अंशों का प्रतिनिधित्व करते हैं। अधिकमास में इनके दर्शन से जीवन के समस्त दोषों का शमन होता है। प्रत्येक महादेव पर अलग-अलग अनाज और पूजन सामग्री के दान की परंपरा है।

नौ नारायण दर्शन:

उज्जैन में भगवान विष्णु के नौ स्वरूप विराजमान हैं। पुरुषोत्तम मास को भगवान विष्णु का विशेष मास माना जाता है। इस दौरान नौ नारायण की यात्रा करने से सुख, समृद्धि और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

सप्त सागर पूजन:

रुद्र सागर, क्षीर सागर और गोवर्धन सागर सहित सात पवित्र सागरों के दर्शन से मन और आत्मा को शांति मिलती है। यहां दीपदान और वस्त्र दान का विशेष महत्व है।

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 ‘तीस’ की संख्या का विशेष महत्व

धर्मशास्त्रों के अनुसार अधिकमास में ‘तीस’ की संख्या का विशेष महत्व होता है। मालवा क्षेत्र में इस माह के दौरान मालपुए, कांसे के पात्र, फल और धार्मिक ग्रंथों के दान की परंपरा है। श्रद्धालु अपनी सामर्थ्य के अनुसार अन्न, वस्त्र, पात्र अथवा रत्नों का दान कर पुण्य अर्जित करते हैं।



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