प्रयागराज माघ मेला के दौरान ज्योतिष पीठ जोशीमठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती महाराज के साथ माघ मेला प्रशासन एवं पुलिसकर्मियों द्वारा किए गए कथित दुर्व्यवहार और दमनात्मक कार्रवाई के विरोध में उज्जैन के रामघाट पर सद्बुद्धि यज्ञ का आयोजन किया गया। यह सद्बुद्धि यज्ञ मंगलवार सुबह रामघाट पर संपन्न हुआ, जिसमें संत समाज, ब्राह्मण समाज, तीर्थ पुरोहित, पुजारीगण एवं सनातन धर्मावलंबियों की उपस्थिति रही।

सुरेंद्र चतुर्वेदी ने जानकारी देते हुए बताया कि इस यज्ञ का उद्देश्य माघ मेला प्रशासन एवं संबंधित अधिकारियों को सद्बुद्धि प्रदान करना तथा सनातन परंपराओं, शंकराचार्य जी, उनके सनातनी शिष्यों एवं विप्र ब्राह्मण समाज के सम्मान की रक्षा का संदेश देना था। सद्बुद्धि यज्ञ का आयोजन निरमोहिया अखाड़ा के महामंडलेश्वर ज्ञानदास महाराज (दादूराम आश्रम) एवं दंत सन्यासी उपनिषद आश्रम के संस्थापक वितरागानंद सरस्वती महाराज के सान्निध्य में किया गया। कार्यक्रम के माध्यम से उपस्थित संतों एवं समाजजनों ने एक स्वर में शंकराचार्यजी के प्रति सम्मान व्यक्त करते हुए प्रशासन से भविष्य में इस प्रकार की घटनाओं की पुनरावृत्ति न होने की मांग की।

यज्ञ में प्रमुख रूप से सुरेंद्र चतुर्वेदी, त्रिशूल शिवगण वाहिनी के संस्थापक आदित्य नागर, पूर्व अपर आयुक्त वी.के. शर्मा, पंडित शैलेंद्र द्विवेदी, पंडित राजेश व्यास, गौरव नारायण उपाध्याय (धर्माधिकारी), मोहनलाल त्रिवेदी, यश जोशी, पार्षद अर्पित दुबे, शैलेश दुबे, संजय जोशी, कुंड वाला वेदप्रकाश त्रिवेदी, आदित्य नारायण जोशी एवं दीपक शर्मा सहित अनेक गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।

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अखिल भारतीय पुजारी महासंघ का बयान

अखिल भारतीय पुजारी महासंघ के राष्ट्रीय सचिव रूपेश मेहता ने कहा कि सनातन धर्म में चादर ओढ़ाने की कोई परंपरा नहीं है। चादर चढ़ाने की परंपरा मुस्लिम समाज की धार्मिक प्रथा से जुड़ी हुई है। उन्होंने कहा कि शंकराचार्य की स्थापना, पदवी और पद स्वयं सिद्ध हैं, जैसे देश के 12 ज्योतिर्लिंग स्वयंभू माने जाते हैं, उसी प्रकार शंकराचार्य पद भी स्वयं प्रतिष्ठित है।

उन्होंने कहा कि जब भारत में सनातन धर्म को ठेस पहुंचाने का प्रयास किया गया, तब भगवान शंकर के अंश रूप में आदि शंकराचार्य का प्रादुर्भाव हुआ और उन्होंने सनातन धर्म की रक्षा के लिए पूरे भारत का भ्रमण किया। जहां शास्त्रों से विरोधियों को परास्त किया जा सकता था, वहां शास्त्र का प्रयोग किया गया और जहां आवश्यक हुआ, वहां शस्त्र का सहारा लिया गया।

रूपेश मेहता ने बताया कि आदि शंकराचार्य ने सनातन धर्म की रक्षा के लिए अखाड़ों की स्थापना एक संगठित शक्ति के रूप में की थी। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जिस प्रकार खेत की रक्षा के लिए बाड़ लगाई जाती है, यदि वही बाड़ खेत को नुकसान पहुंचाने लगे तो उसकी उपयोगिता समाप्त हो जाती है। उन्होंने आरोप लगाया कि वर्तमान में अखाड़ा परिषद शंकराचार्य पर आरोप-प्रत्यारोप कर रही है और 13 अखाड़ों द्वारा चादर ओढ़ाने के माध्यम से मान्यता देने का प्रयास किया जा रहा है, जिसकी अखिल भारतीय पुजारी महासंघ कड़े शब्दों में निंदा करता है।

उन्होंने कहा कि देश ऋषि-मुनियों की परंपरा से बना है, न कि केवल 13 अखाड़ों और साधु-संतों से। इसलिए अब चादर ओढ़ाने की परंपरा को समाप्त किया जाना चाहिए तथा शंकराचार्यजी को शंकरानंद अखाड़े के नाम से स्वयं का अखाड़ा स्थापित करना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि वर्तमान स्वरूप में 13 अखाड़ों की देश को आवश्यकता नहीं रह गई है।



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