ओबीसी के 27 प्रतिशत आरक्षण से जुड़े बहुचर्चित मामले में सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण आदेश पारित करते हुए प्रकरण को पुनः मध्य प्रदेश हाईकोर्ट को भेज दिया है। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि राज्य के कानून की संवैधानिकता की जांच का अधिकार अनुच्छेद 226 के तहत सर्वप्रथम हाईकोर्ट को है। साथ ही निर्देश दिया गया है कि हाईकोर्ट इस मामले का दो माह के भीतर निस्तारण करे। यह सुनवाई ‘शिवम गौतम एवं अन्य बनाम मध्यप्रदेश राज्य’ प्रकरण में हुई, जो ओबीसी वर्ग के 27% आरक्षण और 13 प्रतिशत ‘होल्ड’ पदों से संबंधित है। यह मामला लंबे समय से लंबित था और इसे ओबीसी अभ्यर्थियों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

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हाईकोर्ट करेगा अंतिम सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चूंकि मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने अभी तक अंतिम निर्णय नहीं दिया है और राज्य सरकार स्वयं ट्रांसफर याचिका के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट आई थी, इसलिए प्रकरण को वापस हाईकोर्ट भेजना उचित है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि हाईकोर्ट इस मामले की स्वतंत्र रूप से सुनवाई करने के लिए स्वतंत्र है। साथ ही, सुप्रीम कोर्ट ने 13 प्रतिशत ‘होल्ड’ पदों को हटाने अथवा किसी अंतरिम राहत पर कोई विशेष टिप्पणी करने से इनकार कर दिया। इससे पूर्व हाईकोर्ट द्वारा दिए गए अंतरिम आदेश अब प्रभावी नहीं रहेंगे। सुनवाई के दौरान अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (एएसजी)  नटराज ने अदालत को अवगत कराया कि राज्य सरकार मामले को हाईकोर्ट भेजे जाने के पक्ष में है। इसे राज्य सरकार के रुख में परिवर्तन के रूप में देखा जा रहा है, क्योंकि प्रारंभ में राज्य ने ही याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में स्थानांतरित कराई थीं।

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ओबीसी आरक्षण 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत किया

मध्य प्रदेश में वर्ष 2019 में पारित कानून के माध्यम से ओबीसी आरक्षण 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत किया गया था। हालांकि हाईकोर्ट के अंतरिम आदेशों के कारण इसे पूर्ण रूप से लागू नहीं किया जा सका। वर्तमान में भर्ती परीक्षाओं में 87:13 का फॉर्मूला लागू है, जिसके तहत 87 प्रतिशत परिणाम घोषित किए जाते हैं, जबकि 13 प्रतिशत पद ‘होल्ड’ रखे जाते हैं। इन्हीं ‘होल्ड’ पदों को चुनौती दी गई है। राज्य में ओबीसी आबादी 50 प्रतिशत से अधिक बताई जाती है, जिससे यह मामला सामाजिक और संवैधानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

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ओबीसी समाज की प्रतिक्रिया

लगातार सुनवाई टलने और अंतरिम राहत न मिलने से ओबीसी अभ्यर्थियों में असंतोष है। उनका कहना है कि लाखों युवाओं का भविष्य 13 प्रतिशत पदों के कारण प्रभावित हो रहा है। ओबीसी महासभा ने इसे सामाजिक न्याय और संवैधानिक अधिकारों का विषय बताया है। संगठन से जुड़े लोकेंद्र गुर्जर ने कहा कि यदि निर्धारित समय-सीमा में निर्णय नहीं आया, तो समाज लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखने को बाध्य होगा। अब निगाहें मध्य प्रदेश हाईकोर्ट पर हैं, जिसे सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार दो माह के भीतर अंतिम निर्णय देना है। मामले की विस्तृत कानूनी स्थिति सर्वोच्च न्यायालय के लिखित आदेश के बाद और स्पष्ट होगी।



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