नवग्रह पीठ के प्राण प्रतिष्ठा महोत्सव के दौरान बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर धीरेंद्र शास्त्री ने संगत, सत्संग और अच्छे आचरण पर युवाओं को मार्गदर्शन दिया। उन्होंने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा, “मेरी सहेली बेकार थी, मेरा दोस्त बेकार था। अरे नकटी, दुर्गा, काली, त्रिपुर सुंदरी बेटियों, तुम दुर्गा बनो, तुम काली बनो, पर कभी बुर्के वाली न बनो।”

संगत और सत्संग का महत्व

शास्त्री ने संगत के प्रभाव पर जोर देते हुए कहा कि युवा अक्सर अपनी संगत को अपनी स्थिति का कारण बताते हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि राम के राज्य में मंथरा नहीं सुधरी और रावण के राज्य में विभीषण कभी नहीं बिगड़ा। इसका मतलब है कि संगत तभी असर डालती है जब स्वयं में कमी हो। उन्होंने कहा कि केवल सत्संग सुनने से जीवन नहीं सुधरता, बल्कि उसे जीवन में अपनाने से सुधार आता है। उन्होंने समझाया कि हनुमान जी को मानने से नहीं, बल्कि उनकी बातों को मानने से कृपा प्राप्त होती है। उन्होंने जलते दीपक का उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे बुझा दीपक जलते दीपक के पास प्रज्ज्वलित हो जाता है, उसी प्रकार सत्संग एक जलता हुआ दीपक है, और जो इसमें आता है, वह भी प्रकाशित हो जाता है। उन्होंने कहा कि मन के ‘एंटीवायरस’ को मिटाने के लिए सत्संग आवश्यक है।

अच्छे आचरण और जीवन में सुधार

धीरेंद्र शास्त्री ने अच्छे आचरण पर भी जोर दिया और कहा कि यदि आचरण अच्छा होगा, तो परमात्मा की प्राप्ति संभव है। युवाओं को उन्होंने सलाह दी कि इंस्टा रील के चक्कर में जीवन बर्बाद न करें। शास्त्री के अनुसार, सफलता रील लाइक करने से नहीं, बल्कि रियल लाइफ में मेहनत और पढ़ाई करने से मिलती है। उन्होंने यह भी कहा कि 18 से 25 वर्ष की आयु का युवा यदि इस दौरान बिगड़ता नहीं, तो भविष्य में कभी नहीं बिगड़ेगा, लेकिन जो इस आयु में बिगड़ गया, वह फिर सुधरना मुश्किल है।

महोत्सव में पहुंचे प्रमुख नेता और अभिनेता

आयोजित कार्यक्रम में पूर्व गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा, डिप्टी सीएम राजेंद्र शुक्ला, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल, मंत्री कैलाश विजयवर्गीय और फिल्म अभिनेता आशुतोष राणा भी मौजूद थे। उन्होंने कथा का रसपान किया और पीठ का भ्रमण कर नवग्रह शक्तिपीठ की विशेषता और डबरा की आने वाले समय में पहचान को सराहा। दर्शन के बाद अभिनेता आशुतोष राणा आध्यात्मिक अनुभव से अभिभूत नजर आए। नवग्रह पीठ प्राण प्रतिष्ठा महोत्सव ने युवाओं को जीवन में सही संगत, सत्संग और अनुशासित आचरण की दिशा में सोचने का अवसर प्रदान किया।



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