मध्यप्रदेश में बच्चों की मौतों से जुड़े कोल्ड ड्रिंक सिरप मामले के बाद भी सरकारी अस्पतालों में दवाओं की गुणवत्ता पर सवाल थमने का नाम नहीं ले रहे हैं। राजधानी के जेपी अस्पताल से इलाज के नाम पर खराब दवाएं दिए जाने के दो मामले सामने आए हैं, जिससे स्वास्थ्य व्यवस्था की निगरानी पर गंभीर प्रश्न खड़े हो गए हैं। हैरानी की बात यह है कि 3 दिन में ही जिला अस्पताल से जुड़ी दो शिकायतें दर्ज की हुईं। पहला मामला 3 जनवरी का है, जब सतीष सेन नामक मरीज ने अस्पताल से मिली डिक्लोफेनाक टैबलेट में फफूंदी होने का आरोप लगाया। इसके तीन दिन बाद 6 जनवरी को मनीष नामक युवक ने गले के इलाज के लिए दिए गए क्लोरहेक्सिडिन माउथ वॉश में कीड़े जैसी आकृति दिखाई देने की शिकायत की। दोनों मामलों के सामने आने के बाद स्वास्थ्य विभाग हरकत में आया है।
जांच के लिए विशेष दल गठित
सीएमएचओ डॉ. मनीष शर्मा ने इन शिकायतों को गंभीर मानते हुए पांच सदस्यीय विशेष जांच दल का गठन किया है। इस टीम में फूड एंड ड्रग विभाग के अधिकारी और स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारी शामिल हैं। दल को जेपी अस्पताल की फार्मेसी, ड्रग स्टोर और मरीजों को दी जा रही दवाओं के पूरे स्टॉक की जांच के निर्देश दिए गए हैं।
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इन दवाओं पर उठा संदेह
जिन दवाओं को लेकर शिकायतें आई हैं, उनमें दर्द निवारक डिक्लोफेनाक 50 एमजी टैबलेट और गले के संक्रमण में इस्तेमाल होने वाला 50 एमएल का क्लोरहेक्सिडिन माउथ वॉश आईपी 0.2 प्रतिशत शामिल है। माउथ वॉश का सैंपल लैब टेस्ट के लिए भेज दिया गया है, ताकि उसमें दिख रही संदिग्ध वस्तु की पुष्टि हो सके।
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अस्पताल प्रशासन की चुप्पी
पूरे मामले में जेपी अस्पताल के सिविल सर्जन डॉ. संजय जैन की चुप्पी भी सवालों के घेरे में है। उन्होने कहा कि आप अस्पातल आ कर समझ लें ऐसे कुछ कहना सही नहीं होगा। जबकि अस्पताल के स्टोर स्टाफ का कहना है कि जेपी अस्पताल परिसर में नमी एक बड़ी समस्या है। ड्रग स्टोर और फार्मेसी की दीवारों में लगातार सीलन रहती है, जिसकी शिकायतें पहले भी सिविल सर्जन कार्यालय में की जा चुकी हैं। आशंका जताई जा रही है कि यही नमी दवाओं की गुणवत्ता खराब होने की एक बड़ी वजह हो सकती है।अब जांच के नतीजों पर सबकी नजर है। सवाल यह है कि क्या कोल्ड सिरप मामले के बाद भी स्वास्थ्य व्यवस्था दवाओं की गुणवत्ता सुनिश्चित करने में नाकाम साबित हो रही है, या फिर इन शिकायतों के पीछे कोई और सच्चाई सामने आएगी।
