मध्य प्रदेश के सतना जिले का सोनौरा गांव आज देश ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी अपनी अलग पहचान बना रहा है। यहां तैयार हो रहे बांस से बने उत्पाद अब केवल घरेलू उपयोग तक सीमित नहीं हैं, बल्कि अमेरिका, जर्मनी, दुबई और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के लग्जरी घरों की शोभा बढ़ा रहे हैं। यह बदलाव संभव हुआ तीन आईआईटी युवाओं की दूरदर्शी सोच और स्थानीय कारीगरों के हुनर के दम पर। वन विश्राम गृह परिसर में संचालित इस यूनिट ने बांस को पारंपरिक उपयोग से निकालकर आधुनिक डिजाइन और तकनीक के साथ एक प्रीमियम ब्रांड में बदल दिया है।

दोस्तों की सोच ने बदली बांस की पहचान

इस नवाचार के पीछे दिल्ली के तीन आईआईटियन दोस्त शशांक गौतम, अनंता वर्सने और ट्विंकल वर्सने हैं। वर्ष 2018 में बैंबू मिशन से जुड़े अधिकारियों से चर्चा के दौरान उन्हें बांस आधारित उद्योग की संभावनाओं का अंदाजा हुआ। शशांक गौतम बताते हैं कि उन्होंने महसूस किया कि बांस के उत्पाद बाजार में तो मौजूद हैं, लेकिन उनकी पहचान सिर्फ सस्ते और अस्थायी सामान तक सीमित है। यही वजह थी कि उन्होंने बांस को लकड़ी, स्टील और प्लास्टिक का स्टाइलिश और टिकाऊ विकल्प बनाने की ठानी।

मिलिंद सोमन के लिए तैयार हो रही बांस ई-साइकिल

इस यूनिट का सबसे खास और चर्चित प्रोडक्ट है बांस से बनी ई-साइकिल। देखने में यह किसी महंगी मेटल साइकिल से कम नहीं लगती, लेकिन इसका फ्रेम पूरी तरह बांस से तैयार किया गया है। यह साइकिल न केवल स्टील जितनी मजबूत है, बल्कि वजन में बेहद हल्की भी है। एक बार चार्ज करने पर यह करीब 100 किलोमीटर तक चल सकती है, जबकि इसकी अधिकतम गति 25 किलोमीटर प्रति घंटा है। साइकिल IoT तकनीक और आधुनिक बैटरी सिस्टम से लैस है। बॉलीवुड अभिनेता और फिटनेस आइकन मिलिंद सोमन ने इस बांस ई-साइकिल को अपने लिए ऑर्डर किया है, जिससे यह प्रोजेक्ट और चर्चा में आ गया है।

बॉलीवुड और विदेशों तक पहुंच रहे उत्पाद

यहां केवल ई-साइकिल ही नहीं, बल्कि डिजाइनर लैंप, सोफा, डाइनिंग टेबल, सजावटी आइटम और पेन स्टैंड सहित 50 से अधिक प्रकार के बांस उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं। इनकी कीमत 4 हजार रुपये से शुरू होकर लाखों रुपये तक जाती है। कर्मचारी पुष्पराज वरुण के अनुसार, इन उत्पादों की फिनिशिंग और डिजाइन इतनी आकर्षक है कि दुबई, मलेशिया, जर्मनी, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका से लगातार ऑर्डर मिल रहे हैं। भारत में भी इंदौर, मुंबई और दिल्ली जैसे महानगरों में इनकी विशेष मांग है। बॉलीवुड अभिनेत्री सोनम कपूर, पूजा भट्ट सहित कई नामी हस्तियां भी यहां के प्रोडक्ट्स अपने घरों तक मंगवा चुकी हैं।

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आदिवासी कारीगरों को मिला रोजगार और सम्मान

यह यूनिट सिर्फ एक बिजनेस मॉडल नहीं, बल्कि स्थानीय रोजगार का मजबूत माध्यम भी बन गई है। बिरसिंहपुर, मझगवां और कुआं गांव के करीब 30-35 कारीगर यहां काम कर रहे हैं। कई आदिवासी महिलाएं अपने घरों से ही बांस के उत्पाद तैयार कर रही हैं। स्थानीय और असम से आने वाले बांस को मशीनों से काटकर ट्रीट किया जाता है, जिसके बाद कारीगर अपने पारंपरिक कौशल से उसे आधुनिक और लग्जरी रूप देते हैं। इससे न केवल आदिवासी हुनर को नई पहचान मिली है, बल्कि गांवों की आर्थिक स्थिति भी मजबूत हुई है। 



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