देश के करोड़ों बच्चों की स्वास्थ्य जांच व्यवस्था में बड़ा बदलाव होने जा रहा है। एम्स भोपाल ने भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) के सहयोग से टेरीय-द्वितीय (टास्कफोर्स ऑन एस्टैब्लिशमेंट ऑफ रेफरेंस इंटरवल्स इन इंडियन पॉपुलेशन फॉर चिल्ड्रन एंड पीडियाट्रिक पॉयुलेशन TERIIP-II) नामक राष्ट्रीय स्तर का बहुकेंद्रित अध्ययन शुरू किया है, जिसके तहत भारतीय बच्चों और किशोरों के लिए रक्त व जैव-रासायनिक जांचों के अपने राष्ट्रीय मानक तय किए जाएंगे।अब तक भारत में बच्चों की अधिकतर लैब रिपोर्ट विदेशी आबादी पर आधारित मानकों से जांची जाती रही हैं, जो भारतीय जलवायु, खान-पान और आनुवंशिक विविधता के अनुरूप नहीं हैं। यही वजह है कि कई बार रिपोर्ट सही होते हुए भी बीमारी का शक पैदा हो जाता है या सही इलाज में देरी होती है।
एम्स भोपाल को मध्य भारत का नोडल सेंटर
इस महत्वाकांक्षी परियोजना में एम्स भोपाल को केंद्रीय क्षेत्र (मध्य भारत) का नोडल केंद्र बनाया गया है। अध्ययन के तहत देश के अलग-अलग हिस्सों से बच्चों के रक्त नमूनों का वैज्ञानिक विश्लेषण कर उम्र, लिंग और क्षेत्र के अनुसार सटीक संदर्भ मानक विकसित किए जाएंगे।
गलत इलाज और अनावश्यक जांच पर लगेगी लगाम
– नए भारतीय मानकों से बच्चों की जांच रिपोर्ट ज्यादा सटीक होगी
– गलत निदान की आशंका घटेगी
– अनावश्यक दवाओं और जांचों से राहत मिलेगी
– समय पर सही इलाज संभव होगा
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ICMR ने दिए करीब 1 करोड़ रुपये
इस राष्ट्रीय अध्ययन के लिए ICMR ने लगभग एक करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता मंजूर की है। परियोजना के प्रमुख अन्वेषक प्रो. (डॉ.) शैलीश बालक हैं, जबकि पैथोलॉजी, बायोकेमिस्ट्री और बाल रोग विभागों के वरिष्ठ विशेषज्ञों की टीम इसमें शामिल है।
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बाल स्वास्थ्य के लिए गेम-चेंजर साबित होगा अध्ययन
एम्स भोपाल के विशेषज्ञों का कहना है कि TERIIP-II अध्ययन के नतीजे पूरे देश की बाल चिकित्सा प्रणाली को नई दिशा देंगे। यह पहल न सिर्फ भारतीय चिकित्सा अनुसंधान के लिए मील का पत्थर साबित होगी, बल्कि बच्चों के बेहतर और सुरक्षित भविष्य की नींव भी रखेगी।
