ग्वालियर हाईकोर्ट ने मुस्लिम उत्तराधिकार कानून पर फैसला देते हुए कहा कि बिना वारिसों की सहमति कोई व्यक्ति संपत्ति के एक-तिहाई से अधिक की वसीयत नहीं कर …और पढ़ें

Publish Date: Fri, 10 Apr 2026 01:45:26 PM (IST)Updated Date: Fri, 10 Apr 2026 01:45:26 PM (IST)

मां के साथ रहने से नहीं छिनता बेटे का हक, MP हाईकोर्ट ने बताई मुस्लिम वसीयत की सीमा
ग्वालियर खंडपीठ ने की मुस्लिम उत्तराधिकार कानून की अहम व्याख्या। (फाइल फोटो)

HighLights

  1. हाईकोर्ट ने मुस्लिम उत्तराधिकार कानून पर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया
  2. बिना सहमति एक-तिहाई से अधिक संपत्ति वसीयत नहीं कर सकते
  3. मां के साथ रहने से बेटे का संपत्ति अधिकार खत्म नहीं

नईदुनिया प्रतिनिधि, ग्वालियर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने मुस्लिम उत्तराधिकार कानून की अहम व्याख्या करते हुए बड़ा फैसला सुनाया। अदालत ने साफ कहा कि कोई भी मुस्लिम व्यक्ति अपनी संपत्ति के एक-तिहाई हिस्से से अधिक की वसीयत नहीं कर सकता, जब तक बाकी वैध वारिस स्पष्ट सहमति न दें। यह सिद्धांत मुस्लिम पर्सनल लॉ की स्थापित व्याख्या से मेल खाता है।

यह पूरा विवाद ग्वालियर के वार्ड-53 स्थित 5280 वर्गफीट जमीन को लेकर दो भाइयों के बीच था। पिता के निधन के बाद एक भाई ने दावा किया कि पूरी जमीन उसके नाम वसीयत की गई थी। उसका कहना था कि दूसरा भाई माता-पिता के तलाक के बाद अपनी मां के साथ रहने लगा था, इसलिए उसे पिता की संपत्ति में कोई हक नहीं है, लेकिन हाईकोर्ट ने इस दलील को पूरी तरह खारिज कर दिया।

बेटे का पिता की संपत्ति पर वैधानिक अधिकार

  • अदालत ने स्पष्ट कहा कि मां के साथ रहने या माता-पिता के तलाक के बाद भी बेटे का अपने जैविक पिता की संपत्ति पर वैधानिक अधिकार समाप्त नहीं होता। मुस्लिम कानून में ऐसा कोई प्रविधान नहीं है, जिससे बेटे को विरासत से बेदखल माना जाए।
  • अदालत ने फैसले में यह भी दोहराया कि कर्ज और अंतिम संस्कार के खर्च के बाद बची संपत्ति का सिर्फ 33.3 प्रतिशत हिस्सा ही वसीयत किया जा सकता है। यदि इससे अधिक हिस्से की वसीयत की जाती है, तो वह तभी मान्य होगी जब बाकी सभी वारिस लिखित या स्पष्ट सहमति दें।
  • कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी वारिस का चुप रहना सहमति नहीं माना जाएगा। इस मामले में ट्रायल कोर्ट ने पहले ही पूरी संपत्ति की वसीयत को अमान्य मानते हुए दोनों भाइयों का 50-50 प्रतिशत हक तय किया था।
  • ट्रायल कोर्ट के फैसले को रखा बरकरार

    वर्ष 2007 के इस आदेश को चुनौती देते हुए एक भाई ने हाईकोर्ट में अपील दायर की, लेकिन 8 अप्रैल को ग्वालियर खंडपीठ ने अपील खारिज कर ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा।



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