मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने ओबीसी क्रीमी लेयर से जुड़े एक अहम मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए साफ किया है कि किसी महिला अभ्यर्थी की क् …और पढ़ें

Publish Date: Sun, 05 Apr 2026 09:54:13 PM (IST)Updated Date: Sun, 05 Apr 2026 09:54:13 PM (IST)

MP हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला... पति की कमाई नहीं है क्रीमी लेयर का पैमाना
MP हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

HighLights

  1. महिला उम्मीदवार की क्रीमी लेयर स्थिति के लिए पति की आय आधार नहीं होगी
  2. ग्वालियर खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि माता-पिता की आर्थिक स्थिति ही मान्य है
  3. हाई कोर्ट ने सहायक प्राध्यापक पद पर गरिमा राठौर की नियुक्ति को सही ठहराया

नईदुनिया प्रतिनिधि, ग्वालियर। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने ओबीसी क्रीमी लेयर से जुड़े एक अहम मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए साफ किया है कि किसी महिला अभ्यर्थी की क्रीमी लेयर स्थिति तय करने में उसके पति की आय को आधार नहीं माना जाएगा। अदालत ने कहा कि महिला उम्मीदवार के लिए क्रीमी लेयर का निर्धारण माता-पिता की सामाजिक और आर्थिक स्थिति के आधार पर किया जाएगा, न कि पति या स्वयं की आय से।

सहायक प्राध्यापक की नियुक्ति के विरुद्ध दायर की गई थी याचिका

मध्य प्रदेश के शासकीय डिग्री कॉलेज में सहायक प्राध्यापक (विधि) के पद पर चयनित अभ्यर्थी गरिमा राठौर को ओबीसी (महिला) आरक्षित पद का लाभ दिए जाने को चुनौती देते हुए सुनीता यादव ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिका में कहा गया था कि गरिमा के पति सिविल जज हैं और उनके परिवार की कुल आय निर्धारित सीमा से अधिक है, इसलिए वह क्रीमी लेयर में आती हैं और उनकी नियुक्ति निरस्त की जानी चाहिए।

माता-पिता की सामाजिक स्थिति ही होगी मुख्य पैमाना

सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने क्रीमी लेयर की कानूनी परिभाषा को स्पष्ट करते हुए कहा कि पति के क्लास-वन अधिकारी होने के आधार पर नियमों में जब तक विशेष स्थिति लागू न हो, केवल पति की आय जोड़कर महिला को क्रीमी लेयर नहीं माना जा सकता। हाई कोर्ट ने यह भी देखा कि गरिमा राठौर के पिता क्लास-तीन के कर्मचारी थे और माता गृहिणी हैं, इसलिए वह ओबीसी आरक्षण का लाभ लेने की पात्र है।

सेवा लाभ और वरिष्ठता की मांग को कोर्ट ने किया अस्वीकार

याचिका में सुनीता यादव ने 2021 से वरिष्ठता और नियुक्ति लाभ की भी मांग की थी। उनका कहना था कि यदि गरिमा राठौर की नियुक्ति न होती, तो उन्हें 2021 में ही यह पद मिल जाता। हालांकि, सुनीता यादव को बाद में 2023 में नियुक्ति मिल चुकी है, फिर भी उन्होंने 2021 से सेवा लाभ, वरिष्ठता और अन्य लाभ मांगे। हाई कोर्ट ने इस मांग को भी स्वीकार नहीं किया और अंततः याचिका खारिज कर दी।



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