भोपाल में मध्य प्रदेश सरकार के नए शिक्षा सत्र की शुरुआत के साथ चलाया गया स्कूल चलें हम अभियान अव्यवस्थाओं की भेंट चढ़ता नजर आया। जिला प्रशासन ने 102 अधिकारियों एसडीएम, तहसीलदार, इंजीनियर, आरटीओ और अन्य विभागों के अफसरों की ड्यूटी स्कूलों में लगाई, लेकिन जमीनी स्तर पर यह पूरी कवायद बिखरी हुई दिखी। सबसे बड़ी चूक सूची के वितरण में सामने आई। कलेक्टर कार्यालय से 102 अधिकारियों की ड्यूटी की लिस्ट तो जारी हुई, लेकिन कई अधिकारियों तक यह पहुंची ही नहीं। ऐसे में तय कार्यक्रम के मुताबिक स्कूलों में उनकी मौजूदगी ही नहीं हो सकी। सिर्फ अधिकारी ही नहीं, कई सरकारी स्कूलों के प्रिंसिपल भी इस पूरे कार्यक्रम से अनजान रहे। उन्हें यह तक नहीं पता था कि उनके स्कूल में कौन अधिकारी आने वाला है। इससे स्कूल स्तर पर कोई तैयारी ही नहीं हो पाई। शहर के चार एसडीएम से बातचीत में खुलासा हुआ कि उन्हें पहले से कोई सूचना नहीं थी। एक एसडीएम ने बताया कि शनिवार सुबह लिस्ट मिली है। लेकिन वह बाहर किसी कार्यक्रम से आए हुए हैं। एक एसडीएम ने कहा शायद मेरा नाम नहीं है जबकि उनका लिस्ट में नाम मौजूद है। 

सीएम ने किया था अभियान का शुभारंभ

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने 1 अप्रैल को नए शैक्षणिक सत्र 2026-27 की शुरुआत की थी। इसके तहत 1 से 4 अप्रैल तक ‘स्कूल चलें हम’ अभियान चलाया जा रहा है, जिसका मकसद बच्चों का नामांकन बढ़ाना और उन्हें स्कूल से जोड़ना है।

अलग-अलग गतिविधियां तय की गईं

1 अप्रैल: बालसभा और प्रवेशोत्सव

2 अप्रैल: भविष्य से भेंट कार्यक्रम

3 अप्रैल: सांस्कृतिक और खेल गतिविधियां

4 अप्रैल: पिछड़े छात्रों पर फोकस और एसएमसी बैठक

अफसरों को करना था छात्रों से संवाद

शनिवार को इस अभियान के तहत अधिकारियों को स्कूलों में जाकर छात्रों से बातचीत करने की जिम्मेदारी दी गई थी, लेकिन तालमेल की कमी के चलते यह कार्यक्रम कागज़ों में ही सिमट गया। सरकार का दावा था कि इस अभियान से स्कूलों में नया उत्साह आएगा और कोई भी बच्चा शिक्षा से दूर नहीं रहेगा।

कलेक्टर छुट्टी पर, मॉनिटरिंग कमजोर

पूरे मामले में एक अहम बात यह भी रही कि आदेश जारी करने वाले भोपाल कलेक्टर कौशलेंद्र विक्रम सिंह खुद अवकाश पर थे। इससे अभियान की मॉनिटरिंग और क्रियान्वयन दोनों प्रभावित हुए।

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कुछ जगह पहुंचे अफसर, लेकिन गिने-चुने

हालांकि गोविंदपुरा एसडीएम भुवन गुप्ता दोपहर करीब 2 बजे नवीन कन्या हाई सेकेंडरी स्कूल पहुंचे और छात्रों से संवाद किया, लेकिन ऐसे मामले बहुत कम रहे। कुछ स्कूलों में शिक्षा विभाग के अधिकारी पहुंचे और विद्यार्थियों से संवाद किया लेकिन अधिकतर स्कूलों में कोई अधिकारी नहीं पहुंचा। 

 



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