गणगौर पूजन चैत्र शुक्ल पक्ष की तृतीया को देश के कई हिस्सों के साथ मध्य प्रदेश के मालवा और निमाड़ में शनिवार को बड़े जोर-शोर से मनाया जाएगा। गणगौर पर्व मुख्यतः गौरा और ईशर जी यानी शिव और पार्वती की पूजा और उपासना का प्रमुख पर्व है। गणगौर पर्व मुख्य रूप से राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में भक्तिभाव से मनाया जाता है। यह त्योहार भगवान शिव (ईशर जी) और माता पार्वती (गौरा) के मिलन, प्रेम और वैवाहिक सुख का प्रतीक है। 

नौ दिवसीय गणगौर पर्व सुखी-संपन्न दांपत्य जीवन के साथ खेती-संस्कृति और फसल से जुड़ा उत्सव भी है। एक बालिका के जन्म से लेकर विवाह, ससुराल विदाई, संतान प्राप्ति और उसके जीवन की संपूर्ण परिस्थितियों की अभिव्यक्ति इन नौ दिनों के दौरान गाए जाने वाले गीतों के माध्यम से व्यक्त होती है। शिव-गौरा, ब्रह्मा-सावित्री, विष्णु-लक्ष्मी, चंद्र-रोहिणी, धनीधर-रनुबाई की आराधना के साथ लोक व्यवहार की सीख दी जाती है। 

गणगौर के बाने निकाले जाते हैं

बाग-बगीचों में युवतियों का जाना पाती खेलना और गणगौर के बाने निकालना लोकसंस्कृति का प्रतीक है। इन्हीं लोक संस्कृतियों की परंपरा के माध्यम से जीवन में कई जानकारियां प्राप्त होती हैं।

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होलकर रियासत काल से मनाया जा रहा

गणगौर अनादि काल से मनाया जाने वाला पर्व है। होलकर राज्य में भी यह पर्व मनाया जाता था। सेंट्रल इंडिया के गजेटियर सुपरिंडेंट कैप्टेन सी. ई. लुआर्ड ने इंदौर राज्य का पहला जिला गजेटियर 1907 में प्रकाशित करवाया था। इसमें भी गणगौर पर्व राज्य में भव्य स्तर पर मनाए जाने का उल्लेख है। इसी तरह इंदौर जिला गजेटियर, जो होल्कर प्रेस द्वारा 1931 में एल. सी. धारीवाल के संपादन में प्रकाशित हुआ था, में गणगौर पर्व और गणगौर के नदी के घाट पर जवारों के विसर्जन का उल्लेख है। 

गणागौर घाट पर होता है जवारों का विसर्जन

छत्रीबाग में नदी किनारे गणगौर घाट नगर के सब लोग जानते है। छत्रीबाग के घाटों का निर्माण संभवतः 1852 से 1860 के मध्य हुआ और यहां मंदिरों पर गणगौर माता का जवारों का विसर्जन आरंभ हुआ।  

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स्वागत की रही परंपरा  

गणगौर पर्व पूरे शहर में भव्य पैमाने पर आयोजित होता था। विसर्जन के दिन महिलाएं शिव और पार्वती गणगौर के रूप में लेकर के जब जुलूस के रूप में निकलती थीं तो शिवविलास पैलेस से रियासत की रानियां गणगौर का स्वागत फूलों की वर्षा कर करती थीं। नगर कोतवाल द्वारा डोंडी से सूचित किया जाता था कि गणगौर शिवविलास पैलेस तक जरूर लेकर आएं। गणगौर पैलेस की ओर दोपहर तीन बजे से रात्रि दस बजे तक शहरभर की गणगौर लाई जाती थी, इसलिए इन क्षेत्रों में पुरुषों का प्रवेश प्रतिबंधित रहता था

राजकीय गणगौर भी निकलती थी

नगर में गणगौर मनाने वाले लोगों द्वारा गणगौर को काफी सुसज्जित किया जाता था। लेकिन रियासत की महारानी की गणगौर बड़ी आकर्षक रहती थी। इस गणगौर को राजकीय जवाहरात से हॉउस होल्ड विभाग द्वारा आभूषणों से सजाया जाता था और उन्हें पहना कर सजाया जाता था। आभूषणों से गणगौर और भव्य प्रतीत होने लगती थी। होलकर राजा मराठा  थे पर वे सभी पर्वों और त्योहारों का आदर करते थे, इसलिए राज्य में गणगौर पर्व राजकीय पर्व के रूप में आयोजित किया जाता था।



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